जानिए क्या है सूर्यकिरण-चिकित्सा एवं सूर्य किरणों से ओषधि निर्माण विधि?

सूर्यकिरण-चिकित्सा
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सूर्यकिरण-चिकित्सा: भारतीय वैदिक विज्ञान में प्राचीन काल से ही प्राकृतिक स्रोत को चिकित्सीय कारक के रूप में उपयोग में लाया जाता रहा है। इसमें विशेष उल्लेख सूर्यकिरण-चिकित्सा का किया गया है।

इसके अनेक नाम प्रचलित हैं, जैसे सूर्य-चिकित्सा, सूर्यकिरण-चिकित्सा, रंग-चिकित्सा (Colour-therapy, Chromo-therapy, chromopathy) आदि।

प्राचीन ऋषि-मुनियों ने सूर्य शक्ति प्राप्त करके प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने का सन्देश मानव जाति को दिया था। प्राचीन ऋषि-मुनि और आचार्यो ने सूर्योपासना तथा सूर्यनमस्कार आदि की विधि प्रचलित की, जो मनुष्य को आध्यात्मिक और शारीरिक  रूप से लाभ पहुंचाते है।

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थषशा

वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है।

‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’

अर्थात नीरोगता की इच्छा है तो सूर्य की शरण में जाओ।

सूर्य की किरणें सात रंग की हैं। ऋग्वेद और अथर्ववेद में सूर्य की सात रंग की किरणों का उल्लेख सप्तरश्मि, सप्ताश्व

(सप्त अश्व) आदि शब्दों से किया गया है।

अधुक्षत् पिप्युषीमिषम् ऊर्जं सप्तपदीमरिःसूर्यस्य सप्त रश्मिभिः ||

सूर्य की सात किरणों से सात प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है

सात किरणों के नाम और प्रभाव-

सूर्य से निकलने वाली  इन सात किरणों की तरंगदैर्घ्य (Wave-length) और आवृत्ति (Frequency) अलग-अलग है। अतः इनका प्रभाव भी पृथक्-पृथक् है।

अपनी गति और प्रकृति के अनुसार ये विभिन्न रोगों को दूर करते हैं। इन किरणों को संक्षेप में अंग्रेजी और हिन्दी में ये नाम दिये गये हैं-

  • VIBGYOR
  • बै नी आ ह पी ना ला।

गति और प्रकृति के आधार पर नीचे से ऊपर वाली किरणे क्रमशः अधिक प्रभावशाली हैं। जैसे-लाल से अधिक नारंगी, उससे अधिक पीली और सबसे अधिक प्रभाववाली बैगनी है।

अतः बैगनी से अधिक शक्तिवाली किरणों को परा-बैगनी (Ultra-violet) किरणें और लाल से कम शक्तिशाली किरणों को अवरक्त (Infra-red) किरणे कहते हैं।

सूर्यकिरण-चिकित्सा – ओषधि-निर्माण-विधि

सूर्य से निकलने वाली  इन सात किरणों से ओषधि निर्माण के लिये उसी रंग की काँच की साफ बोतल ली जाती है। विभिन्न रंग की बोतल न मिलनेपर उस रंग का पतला कागज (Color Polythene Sheet) सादी शीशी पर पूरा चिपका दिया जाता है, अतः वह उस रंग का काम दे देती है।

बोतलों को अच्छी तरह साफ करने के बाद उनमें शुद्ध जल भरा जाता है। बोतलोंको कम-से-कम तीन अंगुल खाली रखे। तत्पश्चात् उन्हें ढक्कन लगाकर बंद कर दे।

शुद्ध जल से भरी इन बोतलों को धूप में बोतलों को इस प्रकार रखे कि एक बोतल की छाया दूसरे रंग की बोतल पर न पड़े। रात्रि में बोतलों को अंदर रख ले।

इन बोतलों को धूप में छ:से आठ घंटे रखने पर दवा तैयार हो जाती है।  इस प्रकार बनी हुई दवा रोगी को दिन में तीन या चार बार पिलावे। एक बार बनी दवा को चार या पाँच दिन सेवन कर सकते हैं। पुनः दुबारा बोतलों में दवा बना ले।

साधारणतया नारंगी रंग की दवा भोजन के बाद पंद्रह से तीस मिनट के अंदर लेनी चाहिये। हरे और नीले रंग की दवाएँ खाली पेट या भोजन से एक घंटा पहले ले।

हरे रंग की दवा प्रातः खाली पेट छः से आठ औंस ले सकते हैं। यह दवा विजातीय द्रव्यों Toxins को बाहर निकालकर शरीर को शुद्ध करती है। इसका विपरीत प्रभाव नहीं होता।

दवा की मात्रा –

आयु के अनुसार चाय वाली चम्मच से एक से चार चम्मच एक बार में ले। साधारणतया दवा दिन में तीन या चार बार ले। तीव्र ज्वर आदि में आवश्यकतानुसार एक-एक घंटे पर भी दवा ली जा सकती है।

सूर्यकिरण-चिकित्सा

विभिन्न रंगों की बोतलों के पानी का उपयोग

आइये जानते है सूर्यकिरण-चिकित्सा में विभिन्न रंगो के बोतलों का उपयोग –

  1. लाल (Red): रंग-लाल रंगकी बोतल का पानी अत्यन्त गर्म होता है, अत: इसे पीना वर्जित है। इसको पीने से खूनी दस्त या उलटी हो सकती है। इसका प्रयोग प्रायः मालिश करने या शरीर के बाहरी भाग में लगाने के काम आता है। यह आयोडीन (lodine)-से अधिक गुणकारी यह रक्त एवं स्नायु को उत्तेजित करता है। शरीर में गर्मी बढ़ाता है। यह सभी प्रकार के वात रोग और कफ रोगों में लाभ देता है।
  2. नारंगी (Orange) रंग-यह रक्त संचार की वृद्धि करता है, मांसपेशियोंको स्वस्थ रखता है और मानसिक शक्ति तथा इच्छाशक्ति को बढ़ाता है। बुद्धि और साहस को विकसित करता है। कफ-जन्य रोगों का नाश करता है। यह कफ-जन्य रोग खाँसी, बुखार, निमोनिया, इनफ्लुएन्जा, श्वासरोग, क्षयरोग, पेट में गैस बनना, हृदयरोग, गठिया, पक्षाघात, अजीर्ण, एनीमिया, रक्त में लालकणों की कमी वाले रोगों के लिये लाभप्रद हैं। माँ के स्तनों में दूध की वृद्धि करता है।
  3. पीला (Yellow): रंग-यह शारीरिक और । मानसिक स्वास्थ्यके लिये अत्युत्तम है। यह हल्का रेचक । भी है। पाचन- तंत्र को ठीक करता है। यह हृदय एवं में उदर रोग (Abdominal disease) का नाशक है। इसकी प्रकृति उष्ण है, अत: पेचिश – आदि में इसे न ले। यह पेटदर्द, पेट फूलना, क़ब्ज़, कृमिरोग एवं मेदरोग, तिल्ली, हृदय, जिगर और फेफड़े के रोगों में भी लाभप्रद है। यह युवा पुरुषोंको तत्काल लाभ देता है। इसका पानी थोड़ी मात्रा में ही लेना चाहिये।
  4. हरा (Green): रंग-यह प्रकृतिका रंग है। समशीतोष्ण है। यह शरीर और मन को प्रसन्नता देता है। शरीर की मांसपेशियों का निर्माण करता है और उन्हें शक्ति देता है। मस्तिष्क और नाडी-संस्थान को बल देता है। रक्तशोधक है। यह वातजन्य रोग, टाइफॉइड, मलेरिया आदि ज्वर, यकृत् और गुर्दो की सूजन, सभी चर्मरोग, फोड़ा-फुसी, दाद, नेत्ररोग, मधुमेह, सूखी खाँसी, जुकाम, बवासीर, कैंसर, सिरदर्द, रक्तचाप, एक्जिमा आदि रोगों में लाभप्रद है।
  5. आसमानी (Blue): रंग-यह शीतल है। पित्त-जन्य रोगों के लिये विशेष लाभकारी है। यह प्यास और आमाशयिक उत्तेजना को शान्त करता है। यह अच्छा पोषक टॉनिक और एन्टीसेप्टिक है। सभी प्रकार के ज्वरों के लिये रामबाण है। यह ज्वर, खाँसी, दस्त, पेचिश, संग्रहणी, दमा, सिरदर्द, मूत्ररोग, पथरी, त्वचारोग, नासूर, फोड़े-फुसी, मस्तिष्क आदि रोगों में लाभप्रद है। कफज रोगों में इसका प्रयोग न करे।
  6. नीला, गहरा नीला (Indigo): रंग-यह भी शीतल है। यह जीवमात्र को जीवनी शक्ति देता है। यह शीतलता और शान्ति देता है। कुछ क़ब्ज़ करता है। शरीर पर इसकी क्रिया अतिशीघ्र होती है। यह आमाशय, अण्डकोश-वृद्धि, प्रदर, योनिरोग आदि रोगोंमें विशेष उपयोगी है। यह गर्मी के सभी रोगों को दूर करता है।
  7. बैंगनी (Violet): रंग-इसके गुण प्रायः नीले रंगके तुल्य हैं। यह रक्त में लाल कणों की वृद्धि करता है। खून की कमी को दूर करता है। Anaemia रोग को ठीक करता है। क्षय-रोग (TB) में विशेष उपयोगी है। इससे अच्छी नींद आती है।

उक्त विवेचन के आधारपर कहा जा सकता है कि सूर्य वस्तुतः चर-अचर जगत्की आत्मा है। नीरोगताके लिये सूर्य की शरण में जाना अति-उत्तम है।

इस तरह से हम घर पर ही सूर्यकिरण-चिकित्सा की औषधि निर्माण कर स्वयं तथा समाज का कल्याण कर सकते हैं .

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