Smoking Treatment: जानिए क्या है औषधीय धूम्रपान चिकित्सा

Smoking Treatment
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Smoking Treatment: आयुर्वेदिक ग्रन्थों में औषधियों के धूम्र को पान करने की एक चिकित्सा पद्धति वर्णित है। प्राचीन काल से धार्मिक अनुष्ठानों में यज्ञ अथवा हवन हिंदू धर्म में शुद्धीकरण का एक कर्मकांड है।

हवन कुंड में मन्त्रों के साथ हवन सामग्री की आहुति दी जाता है। वायु प्रदूषण को कम करने के लिए , शुभकामना, स्वास्थ्य एवं समृद्धि इत्यादि के लिए भी हवन किया जाता है।

अग्नि किसी भी पदार्थ के गुणों को कई गुना बढ़ा देती है । जैसे अग्नि में अगर मिर्च डाल दी जाए तो उस मिर्च का प्रभाव बढ़ कर कई लोगो को दुख पहुंचाता है, उसी प्रकार अग्नि में अगर सुगन्धित सामग्री डाल दी जाए तो पूरा परिसर सुगन्धित हो जाता हैं ।

आयर्वेद के आचार्यों ने रोगों के उपचार के लिये विशेष औषधियों द्वारा धूम्रवर्तिका (जड़ीबूटी की चिलम) का निर्माण करके उसे प्रज्वलित कर विधि-पूर्वक धूम्र के सेवन से अनेक रोगों के उपचार किया जाता हैं।

विभिन्न जड़ी-बूटियों का आयुर्वेद में धूम्रपान द्वारा उपयोग कर श्वास (दमा) रोग चिकित्सा में वर्णन है।

Smoking Treatment

आयुर्वेदिक धूम्रपान के लाभ

आयुर्वेदिक धूम्रपान करने से निम्नलिखित विकारों में आराम मिलता है

  1. सिर का भारीपन
  2. शिरःशूल
  3. पीनस
  4. अर्धावभेदक (Hemicrania)
  5. शूल
  6. कास
  7. हिचकी
  8. दमा
  9. गलग्रह
  10. दाँतों की दुर्बलता
  11. कान
  12. नाक
  13. नेत्रों से दोषजन्य-स्रावका होना
  14. नाक से दुर्गन्ध का निकलना (Ogoena)
  15. आस्यगन्ध (Foul smell of mouth)
  16. दाँत का शूल
  17. खालित्य
  18. केशों का पीला होना
  19. केशों का गिरना (इन्द्रलुप्त)
  20. छींक आना
  21. बुद्धि (ज्ञानेन्द्रियों)-का व्यामोह होना तथा अधिक निद्रा आना आदि अनेक रोग शान्त होते हैं।

बाल, कपाल, इन्द्रियों का तथा स्वर का बल अधिक बढ़ता है, जो व्यक्ति मुख से धूम्र-सेवन करता है, उसे विशेषकर शिरोभाग में वात-कफ जन्य बलवती व्याधियाँ नहीं होती हैं।

औषधि के धूम्रपान की विधि का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि रोग के अनुसार निर्धारित औषधियों को कूट-छानकर औषधियों के मिश्रण एक सरकंडे (सीक) के ऊपर लपेटकर लम्बी वर्ति (बत्ती) बनानी चाहिये।

छाया में रखने पर जब बत्ती सूख जाय तो सीक को निकालकर घृत, तेल आदि से उसे आर्द्रकर, चिलम (Cigarette Holder) में रखकर अग्नि से जलाकर इस धूम्र का धीरे-धीरे तीन या नौ बार सुखपूर्वक सेवन करना चाहिये।

मिश्रण हेतु औषधियों का वर्णन करते हुए महर्षि  चरक लिखते हैं.

हरेणुकां प्रियङ्गं च पृथ्वीका केशरं नखम्॥

हीवेरं चन्दनं पत्रं त्वगेलोशीरपाकम्।

ध्यामकं मधुकं मांसी गुग्गुल्वगुरुशर्करम्॥

न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षलोधत्वचः शुभाः।

वन्यं सर्जरसं मस्तं शैलेयं कमलोत्पले॥

श्रीवेष्टकं शल्लकी च शुकबर्हमथापि च।

अर्थात् हरेणुका, प्रियंगफल, पृथ्वीका (काला जीरा केशर, नख, हीवेर, सफेद चन्दन, तेजपत्र, दालचीनी, छोटी। इलायची, खश, पद्मांक, ध्यामक, मुलहठी, जटामासी, गुग्गुल, अगर, शर्करा, बरगदकी छाल, गूलरकी छाल, पीपलकी छाल पाकड़ की छाल, लोध की छाल, वन्य, सर्जरस (राल), – नागरमोथा, शैलेय, श्वेत कमलपुष्प, नीलकमल, श्रीवेष्टक, असा शल्लकी तथा शुकबर्ह इन औषधियों के मिश्रण की वर्तिका  (धुप बत्ती) बनानी चाहिये।

 शिरोविरेचनार्थ (सिर के भारी होने या छींक लेने हेतु) निम्न धूम्रपान-योग बताया गया है

श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालं मनःशिला॥.

गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमं मूर्धविरेचने।

अर्थात् अपराजिता,मालकाँगनी, हरताल, मैनसिल, अगर तथा तेजपत्र-इन औषधियों की वर्तिका (धुप बत्ती) बनाकर धूम्रपान करने से शिरोविरेचन होता है। यह चिकित्सा पद्धति अब लुप्त हो गयी है, पर प्राचीन समय में यह मुख्य आरोग्य विधि थी।

(शिरोविरेचन: में औषधियों से सिद्ध धूम्र तेल या गाय के घी, चूर्ण (पावडर) या रस को नाक में छोड़ कर ज़ोर से सांस खींचाने को कहा जाता है।)

वर्तमान में धूम्रपान सिद्धान्त सर्वथा भिन्न है इसमें तंबाकू अथवा मादक पदार्थ के मिश्रण से धूम्रवर्तिका (सिगरेट) का निर्माण किया जाता है जो सर्वथा विनाशकारी और आरोग्यहानिकारक (unhealthy) होता है जो शरीर को अधिक हानि पहुँचाता है तथा नये विकार उत्पन्न करता है।

धूम्रपान चिकित्सा के बारे में नित्यानंदम श्री जी के विचार उनके वीडियो के माध्यम से जाने

स्रोत:  Youtube

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