Sharad Purnima: शरद पूर्णिमा – कोजागर व्रत- रास पूर्णिमा

Sharad Purnima
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Sharad Purnima: शरद पूर्णिमा , हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा या कोजागरी पूर्णिमा  कहते हैं। शारदीय नवरात्रि के समापन के पांचवे दिन आने वाली पूर्णिमा को ही ‘शरद पूर्णिमा’ कहा जाता है।

शरद पूर्णिमा ( Sharad Purnima ) को कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं. सनातन धर्म  के अनुसार पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है।

भगवान् श्री कृष्ण ने इसी तिथि को रासलीला की थी। इसलिये व्रज में इस पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसे ‘रासोत्सव’ या ‘कौमुदी-महोत्सव’ भी कहते हैं। इसलिए इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं।

शरत्पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा की चाँदनी में अमृत का निवास रहता है, इसलिये चन्द्रमा की किरणों से अमृतत्व और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत वर्षा होती है। तभी इस दिन उत्तर भारत में दूध की खीर बनाकर रात भर चन्द्रमा की चाँदनी में रखने का विधान है।

इसी दिन  मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं। जो जाग रहा है उसे धन देती हैं। लक्ष्मी जी को ‘को-जागर्ति’ कहने के कारण इस व्रत का नाम कोजागर व्रत पड़ा। इस दिन को कोजागर व्रत और कौमुदी व्रत भी कहते हैं।

निशीथे वरदा लक्ष्मी: को जागर्तीति भाषिणी।

जगति भ्रमते तस्यां लोकचेष्टावलोकिनी॥

तस्मै वित्तं प्रयच्छामि यो जागर्ति महीतले॥

महालक्ष्मी का श्रीसूक्तलक्ष्मीस्तोत्र का पाठ कर, उपवास करना चाहिये। रात्रि के समय गन्ध-पुष्पादि से पूजित एक सौ (100) दीप कों प्रज्वलित कर देवमन्दिरों, बाग-बगीचों, तुलसी, अश्वत्थवृक्षों के नीचे तथा भवनों में रखना चाहिये।

कोजागरी व्रत ( Sharad Purnima )  लक्ष्मी जी को अतिप्रिय हैं इसलिए इस व्रत का श्रद्धापूर्ण पालन करने से लक्ष्मी जी अति प्रसन्न हो जाती हैं और धन व समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

प्रात:काल होने पर स्नानादि करके इन्द्र का पूजन कर ब्राह्मणों को घी-शक्कर-मिश्रित खीर का भोजन कराकर वस्त्रादि की दक्षिणा देने से अनन्त फल प्राप्त होता है।

व्रत-विधान

Sharad Purnima

इस दिन प्रात:काल अपने आराध्य देव को सुन्दर वस्त्राभूषण से सुशोभित करके उनका यथाविधि पाडशोपचार पूजन करना चाहिये। अर्धरात्रि के समय गोदुग्ध से बनी खीर का भगवान्को भोग लगाना चाहिये।

खीर से भरे पात्र को रात में खुली चाँदनी में रखना चाहिये। चन्द्रकिरणों के द्वारा अमृत गिरता है। पूर्ण चन्द्रमाके मध्याकाश (रात्रि 10 से 12 बजे तक) में स्थित होने पर उनका पूजन कर अर्घ्य प्रदान करना चाहिये।

कथा:

एक ब्राह्मण अपनी दरिद्र से अत्यन्त दुःखित होकर जंगल में चला गया, जहाँ उसे नागकन्याएँ मिलीं। उस दिन आश्विनमास की पूर्णिमा थी।

नागकन्याओं ने ब्राह्मण को रात्रिजागरण कर लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने वाला ‘कोजागरव्रत’ करने को कहा। कोजागर व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण के पास अतुल धन-सम्पत्ति हो गयी। भगवती लक्ष्मी की कृपा से सुखपूर्वक रहने लगा ।

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