Shani ki Sade Sati: क्या है शनि की साढ़े साती

Shani ki Sade Sati
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Shani ki Sade Sati : शनि की साढ़े साती

शनि की साढ़ेसाती का अर्थ है- “कुंडली में चंद्रमा राशि के ऊपर वर्तमान समय में शनि का प्रभाव।“  भारतीय ज्योतिष के अनुसार  ग्रहों की गतिशीलता का जीवन में घटित होने वाली अच्छी या बुरी घटनाओं में बड़ा महत्व है।

इन घटनाओं के आकलन के लिए 27 नक्षत्रों, 9 ग्रहों व 12 राशियों को आधार बनाया गया है। नवग्रहों में से एक ग्रह शनि बारह राशि में भ्रमण करते हुए प्रत्येक राशि पर अपना प्रभाव डालते है शनि की मंथर गति से चलने के कारण ये ग्रह एक राशि में लगभग ढाई वर्ष भ्रमण करते है।

शनि जिस राशि में होते हैं, उस राशि के एक घर आगे की और एक घर पीछे की राशि तक शनि का प्रभाव डालते हुए ये तीन गुणा अर्थात शनि की पूर्ण अवधि का काल (2.6 x 3=7.8) साढ़े सात वर्ष की होती है। अतः एक राशि पर शनि ग्रह की दशा साढ़े सात वर्ष की होती है। ज्योतिष में इसे ही साढ़े साती ( Shani ki Sade Sati ) के नाम से जाना जाता है।

उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि आपकी धनु राशि है:

इस 24 जनवरी 2020 के बाद से शनि धनु (No.9) राशि को छोड़कर एक राशि आगे मकर (No.10) राशि में जाएंगे। शनि महाराज के मकर राशि में प्रस्थान करते ही धनु राशि वालों को कुछ राहत मिलेगी।

लेकिन ध्यान रहे कि धनु राशि वालों की शनि की साढ़े साती ( Shani ki Sade Sati ) समाप्त नहीं हुई है क्यों की ढाई-ढाई वर्ष के 3 पड़ाव होता है। जिसमें की 2 पड़ाव पार कर लिया पर एक अंतिम पड़ाव बाकी है।

धनु राशि के पीछे की राशि वृश्चिक (No.8) राशि वालों को शनि की साढ़ेसाती से मुक्ति होगी.और कुंभ (No.11) राशि वालों की शनि की साढ़ेसाती आरम्भ होगी।

इस प्रकार साढ़े साती की अवधि में शनि तीन राशियों से निकलता है, तो तीनों राशियों के अंशों के कुल समय को दो भागों में विभाजित कर लिया जाता है।

इस प्रक्रिया में चन्द्र राशि से दोनों तरफ (राशि के एक घर आगे की व एक घर पीछे की राशि) एक-एक अंश का अंतर बनता है। शनि जब इस अंश के आरम्भ बिन्दु पर पहुंचता है तब साढ़े साती ( Shani ki Sade Sati ) का आरम्भ माना जाता है, और जब अंतिम अंश को पार कर जाता है तब इसका अंत माना जाता है।

साढ़े साती ( Shani ki Sade Sati ) का प्रभाव:

Shani ki Sade Sati

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अलग अलग राशियों के व्यक्तियों में इसका प्रभाव भी अलग अलग होता है। शनि की ढईया और साढ़े साती को प्रायः अशुभ एवं हानिकारक ही माना जाता है।

ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार शनि सभी व्यक्ति के लिए कष्टकारी नहीं होते हैं। शनि की दशा में बहुत से लोगों को अपेक्षा से बढ़कर लाभ, सम्मान व वैभव की प्राप्ति होती है।

हालांकि कुछ लोगों को शनि की दशा में काफी परेशानी एवं कष्ट का सामना करना होता है। शनि साढ़े साती तीन हिस्सों में होती है. हर एक हिस्सा लगभग 2 वर्ष 6 माह का होता है।

अगर तथ्यों पर ध्यान दे, तो शनि का उद्देश्य व्यक्ति को जीवन भर के लिए सिख देने का होता है. इसलिए पहले 2 वर्ष 6 माह के हिस्से में शनि व्यक्ति को मानसिक रूप से परेशान करता है।

दूसरे हिस्से में आर्थिक, शारीरिक व आत्मविश्वास कमी रूप से क्षति पहुंचाता है, और तीसरे और आखिरी हिस्से में शनि महाराज नुकसान की भरपाई करवाते है। यह वो समय होता है, जब व्यक्ति को सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है।

इस प्रकार शनि केवल कष्ट ही नहीं देते बल्कि शुभ और लाभ भी प्रदान करते हैं। जन्म कुण्डली में चन्द्रमा की स्थिति का आंकलन करने के साथ ही शनि की स्थिति का आंकलन भी आवश्यक होता है।

सबसे पहले देखना होगा कि आपकी ग्रहों दशा क्या है. अगर लग्न,वृष,मिथुन,कन्या,तुला,मकर अथवा कुम्भ है तो शनि हानि नहीं पहुंचाते हैं वरन उनसे लाभ व सहयोग मिलता है शनि यदि लग्न कुण्डली व चन्द्र कुण्डली दोनों में शुभ कारक है तो किसी भी तरह शनि कष्टकारी नहीं होता है।

कुण्डली में स्थिति यदि इसके विपरीत है तो साढ़े साती के समय काफी समस्या और एक के बाद एक कठिनाइयों का सामना होता पड़ता है। यदि चन्द्र राशि एवं लग्न कुण्डली उपरोक्त दोनों प्रकार से मेल नहीं खाते हों अर्थात एक में शुभ हों और दूसरे में अशुभ तो साढ़े साती के समय मिला-जुला प्रभाव मिलता है।

ज्योतिषाचार्य इसके प्रभाव से बचने हेतु कई उपाय बताते हैं:

कहते हैं कि शिव की उपासना करने वालों को साढ़े साती से राहत मिलती है। अत: नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा व अराधना करनी चाहिए। पीपल वृक्ष शिव का रूप माना जाता है, वैसे इसमें सभी देवताओं का निवास मानते हैं।

अतः पीपल को अर्घ्र देने से शनि देव प्रसन्न होते हैं। अनुराधा नक्षत्र में अमावस्या हो और शनिवार का योग हो, उस दिन सरसों तेल, तिल सहित विधि पूर्वक पीपल वृक्ष की पूजा करने से मुक्ति मिलती है, शनिवार को पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

शनिदेव की प्रसन्नता हेतु शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। नित्य सायं शनि मंत्र “ॐ शं शनैश्चराय नमः” का जाप करें. इसके अलावा हनुमान जी को भी रुद्रावतार माना जाता है। अतः उनकी आराधना भी इसके निवारण हेतु फ़लदायी होती है।

मान्यता अनुसार नाव के तले में लगी कील और काले घोड़े का नाल भी इसमें सार्थक उपाय होते हैं। इनकी अंगूठी बनवाकर धारण कर सकते हैं।

शनि से संबंधित वस्तुएं, जैसे लोहे से बने बर्तन, काला कपड़ा, सरसों का तेल, चमड़े के जूते, काला सुरमा, काले चने, काले तिल, उड़द की साबूत दाल, आदि शनिवार के दिन दान करने से एवं काले वस्त्र एवं काली वस्तुओं का उपयोग करने से शनि की प्रसन्नता प्राप्त होती है।

इसके अलावा अन्य उपाय भी बताये जाते हैं। शनि की दशा से बचने हेतु किसी योग्य पंडित से महामृत्युंजय मंत्र द्वारा शिव का अभिषेक कराएं तो भी मुक्ति मिलना संभव होता है।

साढ़े साती के दौरान मन और बुद्धि के सभी दरवाजे़ व खिड़कियां खोल देनी चाहिए। शांत चित्त होकर कोई भी काम करना चाहिए साथ ही निर्णय लेने में भी दिमाग को शांत रखना चाहिए।

जिनके कर्म अच्छे हैं उनको अच्छे फल प्राप्त होगा. और जिनके कर्म बुरे हैं उनको बुरे फल प्राप्त होगा।

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