Raksha Bandhan: जानिए रक्षा बंधन की परंपरा की शुरुवात

Raksha Bandhan
219Views

Raksha Bandhan: श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन रक्षा बंधन (राखी) का त्योहार  मनाया जाता है। रक्षा बंधन भाई बहन के रिश्ते का प्रसिद्ध त्योहार है।

रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंधन का मतलब बाध्य है। रक्षा बंधन के दिन बहनें अपने भाई के दायें हाथ पर राखी बाँधकर उसके माथे पर तिलक करके उसकी आरती उतारी जाती है। और भगवान से अपने भाई के अच्छे भविष्य व दीर्घ आयु की कामना करती है । बदले में भाई उनकी रक्षा का वचन देता है।

भाई बहन एक दूसरे को मिठाई खिलाते हैं और सुख-दुख में साथ रहने का विश्वास दिलाते हैं।  रक्षा बन्धन  ( Raksha Bandhan ) में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्त्व है। राखी या रक्षासूत्र कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है।

राखी के रंगबिरंगे धागे भाई-बहन के प्यार के बन्धन को मज़बूत करते है। यह एक ऐसा पावन पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को पूरा आदर और सम्मान देता है।

इस दिन कलाई में रक्षासूत्र बांधने की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। गुरु शिष्य परंपरा में शिष्य इस दिन अपने गुरुओं को रक्षासूत्र बांधा करते है।

वैदिक काल से लेकर आज तक समाज में ब्राह्मण या पुरोहितों द्वारा यजमानों को रक्षासूत्र (मौली) बांधे जाने की परंपरा है।

प्राचीन काल में पुरोहित राजा और समाज के वरिष्ठजनों को श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधा करते थे।

इस परंपरा की शुरुआत देवासुर संग्राम से हुई थी। लेकिन इसकी शुरुआत कैसे हुई और कैसे श्रावणी उत्सव राखी भाई-बहनों का त्योहार बन गया इसकी रोचक कथाएं हैं।

एक कथा के अनुसार:

इंद्रप्रस्थ में शिशुपाल का वध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र चलाया। चक्र से भगवान की उंगली थोड़ी कट गई और खून आ गया। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर भगवान की उंगली पर लपेट दिया।

कहते हैं जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी। भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया कि वह समय आने पर साड़ी के एक-एक धागे का मोल चुकाएंगे। चीर हरण के समय भगवान ने इसी वचन को निभाया।

दूसरी कथा के अनुसार:

राजा बलि बहुत दानी राजा थे और भगवान विष्णु के अनन्य भक्त भी थे। एक बार उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया।

इसी दौरान उनकी परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु वामनावतार लेकर आए और दान में राजा बलि से तीन पग भूमि देने के लिए कहा। लेकिन उन्होंने दो पग में ही पूरी पृथ्वी और आकाश नाप लिया।

इस पर राजा बलि समझ गए कि भगवान उनकी परीक्षा ले रहे हैं। तीसरे पग के लिए उन्होंने भगवान का पग अपने सिर पर रखवा लिया। फिर उन्होंने भगवान से याचना की कि अब तो मेरा सबकुछ चला ही गया है, प्रभु आप मेरी विनती स्वीकारें और मेरे साथ पाताल में चलकर रहें।

भगवान ने भक्त की बात मान ली और बैकुंठ छोड़कर पाताल चले गए। उधर देवी लक्ष्मी परेशान हो गईं। फिर उन्होंने लीला रची और गरीब महिला बनकर राजा बलि के सामने पहुंचीं और राजा बलि को राखी बांधी।

बलि ने कहा कि मेरे पास तो आपको देने के लिए कुछ भी नहीं हैं, इस पर देवी लक्ष्मी अपने रूप में आ गईं और बोलीं कि आपके पास तो साक्षात भगवान हैं, मुझे वही चाहिए मैं उन्हें ही लेने आई हूं।

इस पर बलि ने रक्षासूत्र का धर्म निभाते हुए मां लक्ष्‍मी को भगवान विष्णु सौंप दिया। देवी लक्ष्मी ने मुंहबोले भाई बलि को राखी बांधकर विष्णु भगवान को मुक्त कराया था।

इसी दिन से राखी भाई बहन का त्योहार बन गया और रक्षा बंधन ( Raksha Bandhan ) का मंत्र भी इसी से बना।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

Raksha Bandhan

भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुए उपरोक्त स्वस्तिवाचन किया (यह श्लोक रक्षा बन्धन ( Raksha Bandhan ) का अभीष्ट मन्त्र है।

रक्षासूत्र के प्रभाव देवासुर-संग्राम मे देवराज इंद्र की विजय हुई। देवराज इंद्र ने यह वरदान दिया कि इस दिन जो भी व्‍यक्ति रक्षासूत्र बांधेगा, वह दीघार्यु और विजयी होगा। इसके बाद से रक्षासूत्र बांधने की परंपरा शुरू हुई

हिन्दू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय कर्मकाण्डी पण्डित या आचार्य संस्कृत में उपरोक्त श्लोक का उच्चारण करते हैं। हिन्दुस्तान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुरुष सदस्य परस्पर भाईचारे के लिये एक दूसरे को भगवा रंग की राखी बाँधते हैं।

तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और उड़ीसा के दक्षिण भारतीय ब्राह्मण इस पर्व को अवनि अवित्तम कहते हैं। महाराष्ट्र राज्य में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से विख्यात है।

यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मणों के लिये यह दिन अत्यन्त महत्वपूर्ण है।  इस दिन नदी या समुद्र के तट पर स्नान करने के बाद ऋषियों का तर्पण कर पुराना जनेऊ बदलकर नया यज्ञोपवीत (जनेऊ)  धारण किया जाता है।

यह भी पढ़ें : Hariyali Teej: हरियाली तीज ( कजली तीज ) क्यों मनाया जाता है ?

admin
the authoradmin

Leave a Reply

eleven − six =