Marijuana: गाँजा से क्रोनिक पेन का सफलतापूर्वक इलाज

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Marijuana:  गाँजा जो कैनाबिस सैटाइवा (Cannabis sativa Linn) नामक वनस्पति से प्राप्त होता है। गाँजा को अंग्रेज़ी में कैनाबीस (Cannabis), मारिजुआना (marijuana), या वीड भी कहते हैं ।

दक्षिण एशिया में चरस, गांजा या भांग के नाम से जाना जाता है। पहले ये मादक पदार्थ मध्य एशिया से चमड़े के थैलों (चरसों) में भरकर आता था।

इसी से उसका नाम चरस पड़ गया। दुनिया की सबसे अच्छी चरस “मलाना क्रिम” के नाम से जानी जाती है। मलाना(मलाना हिल्स हिमाचल) गांव मे यह चरस बनती है। इन मादक पदार्थ का उपयोग चिकित्सा तथा मनोसक्रिय  मादक (psychoactive drug) के रूप में किया जाता है।

अध्ययन में बताया गया है कि गांजे में पाए जाने वाले कैनाबाइडियॉल (सीबीडी) से क्रोनिक पेन का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है और इसके विशेष दुष्परिणाम भी नहीं हैं। इस से मनोरुग्ण का ईलाज किया जाता है।

सनातन धर्म ग्रंथ में भांग व गांजे का उल्लेख शिव कथाओं में मिलता है। इसे पांच प्रमुख पौधों में से एक माना जाता है। होली के पर्व पर भी आज भी भांग के खाने की परंपरा है।

एक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन हुआ तो उसमें से निकला विष भगवान शिव ने पीकर अपने गले में धारण कर लिया था। इससे उन्हें बहुत गर्मी होने लगी। इसलिए शिव जी भांग और गांजे की चिलम पीते हैं , क्योंकि यह दोनों ही ठंडक बढ़ाते हैं।

यह एक कूलैंट का काम करता है। इसीलिए ही उन्हें बेलपत्र, धतूरा और कच्चा दूध चढ़ाया जाता है जो कि ठंडक प्रदान करने का कार्य करता है।

बहुत से तंत्रमार्गी लोगों का मानना है कि भांग और चिलम का सेवन करने से ध्यान अच्छा लगता है। यह मस्तिष्क को शांत रखती है। यही कारण है कि कई अघोरी और नागा चिलम पीते हैं, ताकि वो और भी ध्यान लगा के आनंद प्राप्त कर सकें।

प्राचीन चिकित्सीय ग्रंथ सुश्रुत संहिता में गांजे के चिकित्सीय प्रयोग की जानकारी मिलती है। सुस्ती, नजला और डायरिया में इसके इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है।

दवा के रूप में गांजा विश्व के 18 से ज्यादा देश चिकित्सीय प्रयोग के लिए गांजे को कानूनी वैद्यता प्रदान कर चुके हैं। भारत भी इस सूची में शामिल हो सकता है।

भारत में गांजे का चिकित्सा में प्रयोग मान्य हो सकता है। दो घटनाक्रम इसे बल प्रदान कर रहे हैं। पहला, गांजे को दवा के रूप में मान्यता प्रदान करने के लिए पिछले साल लोकसभा सांसद धर्मवीर गांधी ने लोकसभा में निजी विधेयक पेश किया। दूसरा, महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने मंत्रियों के समूह की बैठक में सुझाव दिया कि गांजे को कानूनी मान्यता दी जाए।

वर्तमान में गांजा रखना, इसका व्यापार, इसे लाना ले जाना और उपभोग करना नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेज एक्ट 1985 के तहत प्रतिबंधित है और ये गतिविधियां गैर कानूनी हैं।

संयुक्त राष्ट्र के पूर्व जनरल सेक्रेटरी कोफी अन्नान कहते हैं कि शुरुआती रुझान बताते हैं “जहां गांजे को वैद्यता प्रदान की गई है, वहां ड्रग और इससे संबंधित अपराधों में बढ़ोतरी नहीं हुई है।

हमें यह सावधानी से तय करना पड़ेगा कि किसे प्रतिबंधित किया जाए और किसे नहीं। ज्यादातर गांजे का प्रयोग विशेष अवसरों पर होता है और यह किसी समस्या से भी नहीं जुड़ा है। फिर भी इससे होने वाले संभावित जोखिमों के कारण इसे विनियमित करने की जरूरत है।”
हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने गांजे के इस्तेमाल से कई बीमारियों को जोड़ा है, मसलन दिमागी क्षमता को क्षति, ब्रोनकाइटिस, फेफड़ों में जलन आदि।

डब्ल्यूएचओ यह भी कहता है कि कुछ अध्ययन बताते हैं कि कैंसर, एड्स, अस्थमा और ग्लूकोमा जैसी बीमारियों के इलाज के लिए गांजा मददगार है। लेकिन उसका यह भी मानना है कि गांजे के चिकित्सीय इस्तेमाल को स्थापित करने के लिए और अध्ययन की जरूरत है।

भांग और गांजा में क्या अंतर होता है:

अक्सर लोग भांग और गांजा को अलग-अलग समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है यह एक ही पौधे की प्रजाति के अलग-अलग रूप हैं. कैनाबिस के पौधों से ही गाँजा, चरस और भाँग ये तीनों प्राप्त किये जाते हैं।

नर प्रजाति कैनाबिस पौधे की पत्तियों को पीसकर भांग को तैयार किया जाता है।

मादा प्रजाति के कैनाबिस पौधे की फूल, पत्ती और जड़ को सुखा कर गांजा तैयार किया जाता है।

गांजा में भांग के मुक़ाबले टेट्राहाइड्रोकार्बनबिनोल यानी THC ज़्यादा होता है।

भारत में गांजे पर प्रतिबंध है जबकि भांग का इस्तेमाल खुले तौर पर किया जा सकता है।

 गाँजा 

मादा प्रजाति के कैनाबिस पौधे मादा पौधों के फूलदार और फलदार शाखाओं को क्रमश: सुखा और दबाकर गाँजा तैयार किया जाता है। जिन पौधों से रेज़िन पृथक्‌ न किया गया हो उन पौधों से गाँजा तैयार होता है।

इनकी पुष्पित शाखाओं को सुखा कर दबाया जाता है। दबाव के कुछ समय तक रखने पर इसमें कुछ रासायनिक परिवर्तन होते हैं और इस से उत्कृष्ट किस्म गाँजा तैयार किया जाता है।अच्छी किस्म के गाँजे में से १५ से २५ प्रतिशत तक रेज़िन और अधिक से अधिक १५ प्रतिशत राख निकलती है।

चरस

चरस के मादा पौधों से पुष्पित अवस्था से कुछ पहले रेज़िन स्राव प्रारंभ होता है. इस रेज़िन को एकत्रित कर लिया जाता है। ताजा चरस मोम की तरह मुलायम और चमकीले हरे रंग का होता है पर कुछ दिनों बाद वह बहुत कड़ा और मटमैले रंग का हो जाता है। इसे ही चरस या ‘सुल्फा’ कहते हैं। अच्छी किस्म के चरस में ४० प्रतिशत राल होती है।

भाँग 

कैनाबिस के नर अथवा नारी, सभी प्रकार के पौधों की पत्तियों से भाँग प्राय: तैयार की जाती है। तैयार करते समय पत्तियों को बारी-बारी से धूप और ओस में रखते हैं और सूख जाने पर इन्हें दबाकर रखते हैं।

भाँग, सिद्धि, विजया आदि नामों से यह प्रसिद्ध है। भांग के सेवन से डोपामाइन हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है.डोपामीन को ‘हैपी हार्मोन’ भी कहते हैं, जो हमारे ख़ुशी के स्तर को बढ़ाता है. कई लोग भांग पीने के बाद ख़ुशी महसूस करते हैं.

भांग का दवा के रूप में इस्तेमाल:

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भांग का इस्तेमाल दवा के रूप में भी किया जाता है. इसमें कई औषधीय गुण पाए जाते हैं.

  • भांग का इस्तेमाल कई मानसिक बीमारियों में भी की जाती है. जिन्हें एकाग्रता की कमी होती है, उन्हें डॉक्टर इसके सही मात्रा के इस्तेमाल की सलाह देते हैं.
  • जिन्हें बार-बार पेशाब करने की बीमारी होती है, उन्हें भांग के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है.
  • कान का दर्द होने पर भांग की पत्तियों के रस को कान में डालने से दर्द से राहत मिलती है.
  • जिन्हें ज़्यादा खांसी होती है, उन्हें भांग की पत्तियों को सुखा कर, पीपल की पत्ती, काली मिर्च और सोंठ मिलाकर सेवन करने की सलाह दी जाती है.

उपर्युक्त तीनों मादक द्रव्यों का उपयोग चिकित्सा में भी उनके मनोल्लास-कारक एवं अवसादक गुणों के कारण प्राचीन समय से होता आया है।

ये द्रव्य दीपन, पाचन, ग्राही, निद्राकर, कामोत्तेजक, वेदनानाशक और आक्षेपहर होते हैं। अत: पाचनविकृति, अतिसार, प्रवाहिका, काली खाँसी, अनिद्रा और आक्षेप में इनका उपयोग होता है।

 Note: इस लेख का उद्देश्य लोगों तक सही जानकारी पहुंचाना है. इन औषधि का सेवन चिकित्सक की सलाह से ही करें।

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