Mantra: मंत्र क्या है, मंत्र के क्या लाभ, मंत्र का जाप 108 बार क्यों किया जाता है ?

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Mantra:  मंत्र, सनातन धर्म में प्राचीन-ऋषि-मुनियों द्वारा अनेक ग्रंथ और अनेक शास्त्रों की रचना की जिसमें देवी- देवताओं की उपासना योग या जप विधि से करने का विधान हैं।

इन विधियों में शब्द विशेष के संयोजन से तैयार मंत्र का प्रयोग किया जाता है। मंत्र का सार ‘मूल शब्द ‘ या ‘ बीज ‘ कहलाता है।  प्रत्येक मूल शब्द एक विशेष ग्रह या स्वामी से संबंधित होता है।

संयोजित शब्दों (मंत्र) का उच्चारण “मंत्र योग” या “मंत्र जप ” कहलाता है। मंत्र की शक्ति उसके शब्दों में होती है। मंत्र के प्रयोग द्वारा उत्पन्न शक्ति को “मंत्र शक्ति” कहा जाता है।

ओंकार (ओउम्) अथवा प्रणव का जप अत्यन्त प्रभावशाली यौगिक अभ्यास है।ओंकार परमात्मा का नाम, मंत्रों का अधिपति है। यही वह स्वरूप है जिसका सृष्टि के प्रारम्भ के लिए उद्भव हुआ ।

मंत्र विज्ञान:

हम जो कुछ भी बोलते हैं उसका प्रभाव व्यक्तिगत और समष्टिगत रूप से सारे ब्रह्माण्ड पर पड़ता है। हमारे मुख से निकला हुआ प्रत्येक शब्द आकाश के सूक्ष्म परमाणुओं में कंपन उत्पन्न करता है और इस कंपन अदृश्य प्रेरणाएँ जाग्रत होती हैं।

वस्तुतः मंत्र विज्ञान में इन्फ्रासोनिक (Infrasonics) स्तर की सूक्ष्म ध्वनियाँ काम करती हैं। मंत्र जप से एक प्रकार की विद्युत चुम्बकीय ( Electromagnetic pulse) तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं। जो समूचे शरीर में फैल कर अनेक गुना विस्तृत हो जाती हैं।

इससे प्राण ऊर्जा की क्षमता एवं शक्ति में वृद्धि होती हैं। मंत्र विद्वानों का मानना है कि मस्तिष्क में विचारों की उपज कोई आकस्मिक घटना नहीं, वरन शक्ति की परतों में आदिकाल से एकत्रित सूक्ष्म कंपन हैं जो मस्तिष्क के ज्ञान कोषों से टकराकर विचार के रूप में प्रकट होते हैं।

श्रद्धा साधना का प्राण है, मूल है इसलिए धीरे- धीरे ही सही, परंतु हृदय की गहराई से मंत्र जप करना चाहिए। मंत्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है । ध्वनि के क्रमबद्ध, लयबद्ध और वृत्ताकार क्रम से निरंतर एक ही शब्द विन्यास के उच्चारण से शब्द तरंगें वृत्ताकार घूमने लगती हैं। इसके फलस्वरूप मंत्र का प्रभाव पड़ने लगता है।

मंत्र जप विधि:

मंत्र जप विशेष विधि-विधान से किया जाता है । मंत्र का शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण तथा लयबद्ध होना अत्यंत आवश्यक है। मंत्र का जप मन को एकाग्र चित्त करके, तन्मयता और श्रद्धा से की जाती है।

मंत्र ध्वनि ऊर्जा, सांस और इन्द्रियों में समन्वय स्थापित करती है।  मंत्र के उच्चारण से जो ध्वनि तरंगे उत्पन्न होती है उससे शक्तिशाली ऊर्जा का निर्माण होता है।

यह आपको सार्वभौमिक ऊर्जा के साथ समकालीन करता है। मंत्र सार्वभौमिक ऊर्जा को आध्यात्मिक ऊर्जा में केंद्रित करके अवचेतन मन को सजग करता है, सचेतक चेतना को जागृत करता है और अपने वांछित लक्ष्य या उद्देश्य की ओर आकर्षित करता है।

भक्ति और विश्वास के साथ मन्त्रों के नियमित जप से उस से सम्बन्धित देवताओं या ग्रह स्वामी की सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा अपनी ओर आकर्षित होती है और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति में सहायता करता है।

यह अपनी समस्याओं के समाधान हेतु एक दिव्य साधन है। मन्त्रों के जप से चित्त में आत्मविश्वास और एकाग्रता की वृद्धि होती है। मंत्रों का उपयोग लाभकारी और हानिकारक दोनों ग्रहों के लिए किया जा सकता है। इन्हें लाभकारी ग्रह की ताकत बढ़ाने और हानिकारक ग्रहों के हानिकारक प्रभाव को कम करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

मंत्रों के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि वे केवल सकारात्मक प्रभाव देते हैं। उनका उपयोग स्वास्थ्य, संपत्ति, भाग्य, सफलता में वृद्धि और परेशानियों कम करने के लिए किया जा सकता है।

मन्त्रों का चयन उसके प्रयोजन के आधार पर किया जाता है। मन्त्रों का चयन के आधार पर ही जप संख्या तथा जप सामग्री का चुनाव होता है।

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किसी मंत्र का जाप 108 बार ही क्यों किया जाता है? माला में 108 दाने क्यों होते हैं ?           

किसी मंत्र का 108 बार जाप क्यों किया जाता है आइए जानते हैं इसके बारे में.

ज्योतिष के अनुसार ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों को 12 राशियों के नाम पर रखा गया है। (इन 12 राशियों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं।)

इन 12 भागों में 9 ग्रह विचरण करते हैं। (इन ग्रहों के नाम सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु)

अतः ग्रहों की संख्या 9 का गुणा राशियों की संख्या 12 हो तो परिणाम संख्या 108 (12 X 9 =108) प्राप्त होती है।

ज्योतिष के अनुसार कुल 27 नक्षत्र होते हैं। हर एक नक्षत्र के 4 चरण होते हैं और 27 नक्षत्रों के कुल चरण 108 ( 27 X 4 =108) ही होते हैं।

अतः माला का एक दाना नक्षत्र के एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है। इन्हीं कारणों से माला में 108 मोती होते हैं। अलग-अलग कार्य सिद्धियों अनुसार मालाओं का चयन होता है।

माला कार्यानुसार तुलसी, वैजयंती, रुद्राक्ष, कमल गट्टे, स्फटिक, पुत्रजीवा, अकीक, रत्नादि किसी की भी हो सकती है। माला के 108 मन के हमारे हृदय में स्थित 108 नाड़ियों के प्रतीक स्वरूप हैं।  माला का 109वां मन का सुमेरु कहलाता है।

जप करने वाले व्यक्ति को एक बार में 108 जाप पूरे करने चाहिए। इसके बाद सुमेरु से माला पलटकर पुनः जाप आरंभ करना चाहिए। किसी भी स्थिति में माला का सुमेरु लांघना नहीं चाहिए।  माला को अंगूठे और अनामिका से दबाकर रखना चाहिए और मध्यमा उंगली से एक मंत्र जपकर एक दाना हथेली के अंदर खींच लेना चाहिए।

तर्जनी उंगली से माला का छूना वर्जित माना गया है।  मानसिक रूप से पवित्र होने के बाद किसी भी सरल मुद्रा में बैठें जिससे कि वक्ष, गर्दन और सिर एक सीधी रेखा में रहे।

मंत्र जप पूरे करने के बाद अंत में माला का सुमेरु माथे से छुआकर माला को किसी पवित्र स्थान में रख देना चाहिए।

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