Kundalini Chakra: हर चक्र के जागने से मिलती है खास शक्ति

kundalini chakra
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Kundalini Chakra:  7-चक्र शक्ति केंद्र 

 मनुष्य शरीर में मुख्य तीन नाडि़यां होती हैं। इड़ा नाडि़, पिंगला नाडि़ और सुषुन्ना नाडि़ एक वक्र पथ से मेरूदंड से होकर जाती है और 7 बार एक-दूसरे को पार करती हैं उस स्थान को प्रतिच्छेदन के बिंदु कहते हैं।

इस प्रतिच्छेदन के बिंदु(Intersection point)  पर ये बहुत ही शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र बनाता है जो चक्र कहलाते है। मनुष्य शरीर में मूल रूप से 7 सात चक्र होते हैं। यह चक्र मानव शरीर के मेरूदंड (Spinal-Cord) में होते हैं।

इन्हें शरीर की समस्त शक्तियों का केंद्र माना जाता है. आइये जानते हैं इन्ही चक्रों के रहस्यों को जो की मूलाधार से सहस्त्रार तक स्थूल रूप में ना ही दिखाई होते हैं और ना ही महसूस होते हैं क्योकि इनका निवास सूक्ष्म में होता हैं।

ब्रह्मांड किरणें से ऊर्जा निकल कर चक्र शक्ति केंद्र पर पड़ती है कि तब ऊर्जा उत्पन्न होती हैं। जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है तब मनुष्य शरीर के निचले हिस्से में स्थित मूलाधार चक्र केंद्र से ऊर्जा नीचे से ऊपर की और गति करती है और विभिन्न केंद्रों को भेदती हुई सिर के शीर्षस्थान पर सहस्रार चक्र तक पहुंचना होती है।

योग:

मन में भाव करे कि सारा आकाश प्रकाशमान है वह सुनहरा प्रकाश पुञ्ज (सुदर्शनचक्र की भाँति) घूमता हुआ हमारे सिर पर धीरे-धीरे आ रहा है। गहरे श्वास की गति के साथ वह बैंगनी प्रकाश छोड़ते हुए सहस्रार चक्र के भीतर प्रवेश कर रहा है।

हमारे गहरे श्वास के साथ वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ क्रमशः आज्ञा-चक्र तक आते हुए नीलवर्ण, विशुद्ध चक्र में हरित-नील (फिरोजी) आभा, अनाहत में हरितवर्ण, मणिपूर में पीतवर्ण, स्वाधिष्ठान में सिन्दूरी वर्ण तथा मूलाधार में रक्तवर्णी आलोक फैलाकर जागरूक चेतना, प्रेम और समृद्धि प्रदान कर रहा है।

चक्र के नाम इस प्रकार है — मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्त्रार कमलदल चक्र,

Muladhar Chakraकुण्डलनी चक्र (Kundalini Chakra ) – मूलाधार चक्र:

– इस चक्र का स्थान मेरु दंड के सबसे निचले हिस्से के पास स्थिति होता हैं।

– यह चक्र चौकोर तथा उगते हुये सूर्य के समान स्वर्ण वर्ण का हैं।

– इस चक्र का सांकेतिक प्रतीक चार पंखुड़िय़ों वाला कमल है। चारों पंखुड़ियाँ इस चक्र में उत्पन्न होने वाले मन के चार तत्वों: मानस, बुद्धि, चित्त  और अहंकार के प्रतीक हैं।

– आध्यात्मिक रूप से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का नियंत्रण करता हैं।

– भौतिक रूप से सुगंध और आरोग्य इसी चक्र से नियंत्रित होते हैं।

– मंत्र : इसका मूल मंत्र ” लं ” हैं। व्यक्ति को पहले प्राणायाम कर के मूलाधार चक्र पर अपना ध्यान केंद्रित कर मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। धीरे धीरे चक्र जागृत होता हैं।

– लाभ: चक्र जागृत होता है व्यक्ति के आत्मिक ज्ञान प्राप्त होता है और जिंदगी में बड़ी से बड़ी जिम्मेवारी लेने की क्षमता बढ़ जाती है, जीवन में बड़े उद्देश्यों की ओर अग्रसर हो जाते हैं, शारीरिक ऊर्जा बढ़ जाती हैं।

  Swadhisthan chakraकुण्डलनी चक्र (Kundalini Chakra ) – स्वाधिष्ठान चक्र: 

– जनन अंग के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी पर स्थित होता है।

– इस चक्र का स्वरुप अर्ध-चन्द्राकार है, यह जल तत्त्व का चक्र है।

-स्वाधिष्ठान चक्र का प्रतीकात्मक चित्र ६ पंखुडिय़ों वाला कमल है। ये पंखुड़ियाँ ६ मनोविकारों- क्रोध, घृणा, वैमनस्य, क्रूरता, अभिलाषा और गर्व के संकेतक हैं जिनपर साधक को विजय पाना होता है।

ये व्यक्ति के विकास में बाधक छः गुणों- आलस्य, भय, संदेह, प्रतिशोध, ईर्ष्या और लोभ के भी संकेतक हैं।

– इस चक्र से निम्न भावनाएँ नियंत्रित होती हैं – अवहेलना,सामान्य बुद्धि का अभाव,आग्रह,अविश्वास,सर्वनाश और क्रूरता

– इसी चक्र से व्यक्ति के अन्दर काम भाव और उन्नत भाव जाग्रत होता है।

– इस चक्र को तामसिक चक्र माना जाता है।

– मंत्र: इसका मूल मंत्र ” वं ” है। यह चक्र जल तत्त्व से सम्बंधित है।

– लाभ: इस चक्र के जागृत होने पर शारीरिक समस्या समाप्त हो जाती है। शरीर में कोई भी विकार जल तत्त्व के ठीक न होने से होता है, इसके जाग्रत होने से जल तत्व का पूर्ण ज्ञान होता है, शारीरिक विकार का नाश हो जाता है जल सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है।  इसके जाग्रत होने पर अवहेलना, क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है।

Manipur chakraकुण्डलनी चक्र (Kundalini Chakra ) – मणिपुर चक्र:

– इसका प्रतीक चिन्ह दस 10 पंखुडिय़ों वाला कमल है। यह मानव शरीर की सभी प्रक्रियाओं का नियंत्रण और पोषण करने वाले दस शक्तियों का प्रतीक है। इसका दूसरा प्रतीक नीचे की ओर शीर्ष बिन्दु वाला त्रिभुज है।

– यह चक्र नाभि के ठीक पीछे स्थित होता है।

– इस चक्र की आकृति त्रिकोण है, और रंग रक्त के समान लाल है।

– यह चक्र ऊर्जा का सबसे बड़ा केंद्र है, यहीं से सारे शरीर में ऊर्जा का संचरण होता है।

– यह अग्नि तत्त्व को नियंत्रित करता है और राजसिक गुण से संपन्न है।

– इस चक्र से निम्न वृत्तियाँ नियंत्रित होती हैं – लज्जा,दुष्ट भाव,ईर्ष्या,सुषुप्ति,विषाद,कषाय,तृष्णा,मोह,घृणा,भय

– मन या शरीर पर पड़ने वाला प्रभाव सीधा मणिपुर चक्र पर पड़ता है।

– मंत्र: इसका का बीज मंत्र “रं” है।

– इस चक्र को जागृत करने के लिए बहुत ज्यादा साधना की जरूरत होती है।

– लाभ: यह चक्र जागृत होते है तब व्यक्ति सर्व शक्ति संपन्न हो जाता है। प्रकृति के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है,जीवो की उत्पत्ति कैसे हुई इसका ज्ञान होता है। यहाँ तक की यह चक्र पूर्व जन्म का ज्ञान भी देता है , भाषा का ज्ञान देता है , अग्नि तत्त्व की सिद्धि देता है।

Anahat Chakraकुण्डलनी चक्र (Kundalini Chakra ) – अनाहत चक्र:

– अनाहत चक्र का प्रतीक चिन्ह 12 बारह पंखुडिय़ों वाला कमल है। इसका आकार षठकोण का है। यह हृदय के १२ दिव्य गुणों- परमानंद, शांति, सुव्यवस्था, प्रेम, संज्ञान, स्पष्टता, शुद्धता, एकता, अनुकंपा, दयालुता, क्षमाभाव और सुनिश्चिय का प्रतीक है। जब अनाहत चक्र की ऊर्जा आध्यात्मिक चेतना की ओर प्रवाहित होती है, तब हमारी भावनाएं भक्ति, शुद्ध, ईश्वर प्रेम और निष्ठा की ओर उन्मुख होती है।

– ह्रदय के बीचों बीच रीढ़ की हड्डी पर स्थित चक्र को अनाहत चक्र कहा जाता है।

– आध्यात्मिक दृष्टि से यहीं से साधक के सतोगुण की शुरुआत होती है. इसी चक्र से व्यक्ति की भावनाएँ और अनुभूतियों की शुरुआत होती है।

– इस चक्र को सौर मंडल भी कहा जाता है. इसका वर्ण हल्का हरा है।

– व्यक्ति की भावनाएँ और साधना की आंतरिक अनुभूतियाँ इस चक्र से सम्बन्ध रखती है।

– मानसिक अवसाद की दशा में इस चक्र पर गुरु ध्यान और प्राणायाम करना अदभुत परिणाम देता है।

– मंत्र: इस चक्र का बीज मंत्र है “यं” है। व्यक्ति को यह चक्र जागृत करने के लिए हृदय पर ध्यान केंद्रित कर के इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। – – लाभ: अनाहत चक्र जागृत होते ही व्यक्ति को बहुत सारी सिद्धियाँ मिलती है।

व्यक्ति को ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से शक्ति प्राप्त होती है , यहाँ तक की यह चक्र जागृत हो जाये तो व्यक्ति सूक्षम रूप ले सकता है और शरीर त्यागने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। आनद प्राप्त होता है। श्रद्धा प्रेम जागृत होता है।  वायु तत्त्व से सम्बंधित सिद्धियाँ प्राप्त होती है। योग शक्ति प्राप्त होती है।

Vishudhh Chakra कुण्डलनी चक्र (Kundalini Chakra ) –विशुद्ध चक्र:

– कंठ के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी पर स्थित चक्र को विशुद्ध चक्र कहा जाता है।

– यह चक्र और भी उच्चतम आध्यात्मिक अनुभूतियाँ देता है, सारी की सारी सिद्धियाँ इसी चक्र में पायी जाती है।

– यह चक्र बहुरंगा है और इसका कोई एक ख़ास स्वरुप नही है।

– यह चक्र आकाश तत्त्व और आठों सिद्धियों से सम्बन्ध रखता है।

– इस चक्र की १६ पंखुड़ियां है।

– कुंडली शक्ति का जागरण होने से जो ध्वनि आती है वह इसी चक्र से आती है।

– इसका बीज मंत्र “हं” है।

– इस चक्र से निम्न वृत्तियाँ नियंत्रित होती हैं – भौतिक ज्ञान, कल्याण, महान कार्य, ईश्वर में समर्पण, विष और अमृत

– इस चक्र के गड़बड़ होने से वैज्ञानिक रूप से थाईराइड जैसी समस्याएँ और वाणी की विकृति पैदा होती है।

– संगीत के सातों सुर इसी चक्र से नियंत्रित होते है।

– मंत्र: व्यक्ति को कंठ पर अपना ध्यान एकत्रित कर “हं” बीज मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

– लाभ: विशुद्ध चक्र बहुत ही महत्वपूर्ण चक्र होता है। यह जागृत होते ही व्यक्ति को वाणी की सिद्धि प्राप्त होता है। इस चक्र के जागृत होने से आयु वृद्धि होती है, संगीत विद्या की सिद्धि प्राप्त होती है, शब्द का ज्ञान होता है। व्यक्ति विद्वान होता है।

Agya chakraकुण्डलनी चक्र (Kundalini Chakra ) – आज्ञा चक्र:

– हिन्दू परम्परा के अनुसार आज्ञा चक्र छठा मूल चक्र है। ध्यान करने से आज्ञा चक्र होने का अभास होता है

– दोनों भौहों के बीच स्थित चक्र को आज्ञा चक्र कहा जाता है।

– यह दो पंखुड़ियों वाला है, एक पंखुड़ी काले रंग की और दूसरी पंखुड़ी सफ़ेद रंग की है।

– सफ़ेद पंखुड़ी ईश्वर की ओर जाने का प्रतीक है और काली पंखुड़ियों का अर्थ संसारिकता की ओर जाने का है।

– इस चक्र के दो अक्षर और दो बीज मंत्र हैं – ह और क्ष

– इस चक्र का कोई ध्यान मंत्र नहीं है क्योंकि यह पांच तत्वों और मन से ऊपर होता है.

– इस चक्र पर मंत्र का सिद्ध करने से शरीर के सारे चक्र नियंत्रित होते हैं.

– इसी चक्र पर इडा,पिंगला और सुषुम्ना आकार खुल जाती हैं और मन मुक्त अवस्था में पंहुँच जाता है.

– लाभ: यह चक्र जागृत होते ही अनंत सिद्धियाँ मिलती है, व्यक्ति इतना सक्षम हो जाता है कि वह अपने आप को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सूक्षम रूप से ले जा सकता है। वह अपनी इच्छा से मोक्ष प्राप्त कर सकता है, उसको अनंत लोक का ज्ञान होता है वह पूर्ण होता है। वह देव तुल्य होता है।

Sahastrar chakra कुण्डलनी चक्र (Kundalini Chakra ) –सहस्त्रार चक्र:

– मष्तिष्क के सबसे उपरी हिस्से पर जो चक्र स्थित होता है, उसे सहस्त्रार कहा जाता है।

– यह (1000) सहस्त्र पंखुड़ियों वाला कमल के समान है और बिलकुल उजले सफ़ेद रंग का है।

– इस चक्र का न तो कोई ध्यान मंत्र है और न ही कोई बीज मंत्र, इस चक्र पर केवल गुरु का ध्यान किया जाता है।

– कुण्डलिनी जब इस चक्र पर पहुँचती है तब जाकर वह साधना की पूर्णता पाती है और मुक्ति की अवस्था में आ जाती है।

– इसी स्थान को तंत्र में काशी कहा जाता है।

– इस स्थान पर सदगुरु का ध्यान या कीर्तन करने से व्यक्ति के मुक्ति मोक्ष का मार्ग सहज हो जाता है।

– यह चक्र योग के उद्देश्य का प्रतिनिधित्व करता है- आत्म अनुभूति और ईश्वर की अनुभूति, जहां व्यक्ति की आत्मा ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है। जिसे यह उपलब्धि मिल जाती है, वह सभी कर्मों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है – पुनर्जन्म और मृत्यु के चक्र से पूरी तरह स्वतंत्र। ध्यान में योगी निर्विकल्प समाधि (समाधि का उच्चतम स्तर) सहस्रार चक्र पर पहुंचता है।

यहां मन पूरी तरह निश्चल हो जाता है और ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय एक में ही समाविष्ट होकर पूर्णता को प्राप्त होते हैं। सहस्रार चक्र में हजारों पंखुडिय़ों वाले कमल का खिलना संपूर्ण, विस्तृत चेतना का प्रतीक है।

इस चक्र के देवता विशुद्ध, सर्वोच्च चेतना के रूप में भगवान शिव है। इसका समान रूप तत्त्व आदितत्त्व, सर्वोच्च, आध्यात्मिक तत्त्व है। मंत्र वही है जैसा आज्ञा चक्र के लिए है-मूल जप ॐ।

NOTE :

आप सभी से नम्र निवेदन है की किसी भी चक्र का बीज मंत्र का उच्चारण करके इन सूक्ष्म चक्रों की शक्तियों को परखने की चेष्टा ना करें क्योकि अगर बिना किसी गुरु के सानिध्य में आप साधनाएं और बीज मन्त्रों का जाप करते हैं तो आपके जीवन में भले ही लाभ ना हो लेकिन हानि भी हो सकती है | लेकिन इसका मतलब ये नहीं की आप BASIC ध्यान क्रियाओं को करने से पीछे हटें

इसके लिए मैं जल्द ही एक और पोस्ट आपसे साझा करूंगा जो की आपके जीवन में बदलाव की नई शुरुआत होगी

कुण्डलिनी शक्ति उसके प्रयोगों और योगिनी शक्तियों के निवास स्थान के बारे में अगली पोस्ट्स में चर्चा की जाएगी

धन्यवाद…

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