Kamasutra: कामसूत्र विश्व की प्रथम यौन संहिता

Kamsutra
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Kamasutra ( कामसूत्र ): सनातन धर्म विश्व का सबसे प्रचीन धर्म है। सनातन धर्म पुर्णत: वैज्ञानिक है, हमारे प्रचीन- ऋषि-मुनियों ने गहन शोध किये और अनेक ग्रंथ और अनेक शास्त्रों की रचना की जिसमें से एक कामसूत्र रचना महर्षि वात्स्यायन द्वारा रचित  एक प्राचीन कामशास्त्र (Sexology) ग्रंथ है।

यह विश्व की प्रथम यौन संहिता (Sex Literature) है, जिसमें यौन प्रेम (Sexual love) के मनोशारीरिक सिद्धान्तों तथा प्रयोग की विस्तृत व्याख्या एवं विवेचना की गई है।

अर्थशास्त्र (Economics) के क्षेत्र में जो स्थान कौटिल्य का है, कामशास्त्र के क्षेत्र में वही स्थान महर्षि वात्स्यायन द्वारा रचित कामसूत्र का है। वात्स्यायन ने कामसूत्र में मुख्यतया धर्म, अर्थ और काम की व्याख्या की है।

धर्म, अर्थ और काम को ‘त्रयी’ कहा जाता है। वात्स्यायन का कहना है कि धर्म परमार्थ का सम्पादन करता है, इसलिए धर्म का बोध कराने वाले शास्त्र का होना आवश्यक है। अर्थसिद्धि के लिए तरह-तरह के उपाय करने पड़ते हैं इसलिए उन उपायों को सिद्ध करने के लिए अर्थशास्त्र की आवश्यकता पड़ती है।

आचार्य का कहना है कि जिस प्रकार धर्म और अर्थ के लिए शास्त्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार काम के लिए भी शास्त्र की आवश्यकता होने से कामसूत्र की रचना की गई है। वात्स्यायन का दावा है कि यह शास्त्र पति-पत्नी के धार्मिक, सामाजिक नियमों का शिक्षक है।

जो दम्पति इस शास्त्र के अनुसार दाम्पत्य जीवन व्यतीत करेंगे उनका जीवन काम-दृष्टि से सदा-सर्वदा सुखी रहेगा। पति-पत्नी आजीवन एक दूसरे से सन्तुष्ट रहेंगे। उनके जीवन में एक पत्नी व्रत या पति व्रत को भंग करने की चेष्टा या भावना कभी पैदा नहीं हो सकती।

ग्रंथ के प्रणयन का उद्देश्य लोकयात्रा का निर्वाह है, न कि राग की अभिवद्धि। इस तात्पर्य की सिद्धि के लिए वात्स्यायन ने उग्र समाधि तथा ब्रह्मचर्य का पालन कर इस ग्रंथ की रचना की

इस ग्रन्थ का अधिकांश भाग काम के दर्श के बारे में है, काम की उत्पत्ति कैसे होती है, कामेच्छा कैसे जागृत रहती है, काम क्यों और कैसे अच्छा या बुरा हो सकता है।

काम एक विस्तृत अवधारणा है, न केवल यौन-आनन्द। काम के अन्तर्गत सभी इन्द्रियों और भावनाओं से अनुभव किया जाने वाला आनन्द निहित है।

फूलो का इत्र, शुद्ध स्वादिष्ट भोजन, त्वचा पर रेशम का स्पर्श, हृदय स्पर्श संगीत, वसन्त का आनन्द – सभी काम के अन्तर्गत आते हैं। वात्स्यायन का उद्देश्य स्त्री और पुरुष के बीच के ‘सम्पूर्ण’ सम्बन्ध की व्याख्या करना था।

ऐसा करते हुए वे हमारे सामने  दैनन्दिन जीवन के मन्त्रमुग्ध करने वाले प्रसंग, संस्कृति एवं सभ्यता का दर्शन कराते हैं। कामसूत्र भारतीय समाजशास्त्र का एक मान्य ग्रंथरत्न बन गया है।

कामदेव को हिंदू शास्त्रों में प्रेम और काम का देवता माना गया है। और रति उनकी पत्नी हैं। आगे वर्णित रतिशास्त्र, रतिक्रीड़ा, कामशास्त्र, कामक्रीड़ा और कामसूत्र शब्द इन्हीं नामों से आया है।

विगत सत्रह शताब्दियों से कामसूत्र का वर्चस्व समस्त संसार में छाया रहा है, और आज भी कायम है।

यद्यपि कामसूत्र दो-ढाई हजार वर्ष पहले रचा गया था, किन्तु इसमें निहित ज्ञान आज भी उतना ही उपयोगी है। इसका कारण यह है कि भले ही प्रौद्योगिकि ने बहुत उन्नति कर ली है किन्तु मनुष्य अब भी एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं, विवाह करते हैं, तथा मनुष्य के यौन व्यहार अब भी वही हैं जो हजारों वर्ष पहले थे।

कामसूत्र गुप्तकाल की रचना है। वात्स्यायन का यह ग्रंथ सूत्रात्मक है। यह सात अधिकरणों, 36 अध्यायों तथा 64 प्रकरणों में विभक्त है। इस रचना में भारतीय सभ्यता पर गुप्तकाल की गहरी छाप है।

संसार की हर भाषा में इस ग्रन्थ का अनुवाद हो चुका है इसके अनेक भाष्य एवं संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं।

कोई दो सौ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध भाषाविद सर रिचर्ड एफ़ बर्टन (Sir Richard F. Burton) ने जब ब्रिटेन में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद करवाया तो पश्चिमी जगत में भूचाल आ गया था।

महर्षि के कामसूत्र ने न केवल दाम्पत्य जीवन का शृंगार किया है, वरन कला, शिल्पकला एवं साहित्य को भी सम्पदित किया है। राजस्थान की दुर्लभ यौन चित्रकारी तथा खजुराहो (M.P.), लिंगराज मंदिर, कोणार्क(Odisa) आदि की जीवन्त शिल्पकला भी कामसूत्र से अनुप्राणित है।

रीतिकालीन कवियों ने कामसूत्र की मनोहारी रचना प्रस्तुत की हैं

कामसूत्र का प्रणयन अधिकरण, अध्याय और प्रकरणबद्ध किया गया है। ग्रंथ 7 अधिकरणों में विभक्त है जिनमें कुल 36 अध्याय तथा 1250 श्लोक हैं।

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इसके सात अधिकरणों के नाम निम्नलिखित हैं –

१. साधारणम् (भूमिका)

२. संप्रयोगिकम् (यौन मिलन)

३. कन्यासम्प्रयुक्तकम् (पत्नीलाभ)

४. भार्याधिकारिकम् (पत्नी से सम्पर्क)

५. पारदारिकम् (अन्यान्य पत्नी संक्रान्त)

६. वैशिकम् (रक्षिता)

७. औपनिषदिकम् (वशीकरण)

  1. प्रथम अधिकरण का नाम साधारण है। इसमें शास्त्र का समुद्देश तथा नागरिक की जीवनयात्रा का रोचक वर्णन है। इसमें वर्णन है कि धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति कैसे की जा सकती है। मनुष्य को श्रुति, स्मृति, अर्थविद्या आदि के अध्ययन के साथ कामशास्त्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। व्यक्ति को पहले कामशास्त्र अध्ययन करना चाहिए, फिर अर्थोपार्जन करना चाहिए। इसके बाद विवाह करके ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश करना चाहिए। विवाह से पूर्व विवाह योग्य स्त्री से परिचय प्राप्त कर प्रेम सम्बन्ध बढ़ाना चाहिए और फिर उसी से विवाह करना चाहिए। ऐसा करने पर ग्रहस्थ जीवन, नागरिक जीवन सदैव सुखी और शान्त बना रहता है।

साधारणम्:   शास्त्रसंग्रहः, त्रिवर्गप्रतिपत्तिः, विद्यासमुद्देशः, नागरकवृत्तम्, नायकसहायदूतीकर्मविमर्शः

2  द्वितीय अधिकरण का नाम साम्प्रयोगिकहै। जिसमें से यौन-मिलन से सम्बन्धित भाग ‘सम्प्रयोग’ का अर्थ सम्भोग (Mating) होता है इसलिए इसका नाम ‘साम्प्रयोगिक’ रखा गया है। इस अधिकरण में 10 अध्याय और 17 प्रकरण हैं। इस में  बताया है कि पुरुष अर्थ, धर्म और काम इन तीनों वर्गों (त्रिवर्ग) को प्राप्त करने के लिए स्त्री को अवश्य प्राप्त करे किन्तु जब तक सम्भोग कला का सम्यक् ज्ञान नहीं होता है तब तक त्रिवर्ग की प्राप्ति समुचित रूप से नहीं हो सकती है और न आनन्द का उपभोग ही किया जा सकता है। इस अधिकरण में स्त्री-पुरुष के सम्भोग विषय की ही व्याख्या विभिन्न रूप से की गई है, यह सम्पूर्ण ग्रन्थ का केवल २० प्रतिशत ही है जिसमें ६९ यौन आसनों का वर्णन है। रतिशास्त्र का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। पूरे ग्रंथ में यह सर्वाधिक महत्वशाली खंड है जिसके दस अध्यायों में रतिक्रीड़ा, आलिंगन, चुंबन आदि कामक्रियाओं का व्यापक और विस्तृत प्रतिपादन हे।

सांप्रयोगिकम्   प्रमाणकालभावेभ्यो रतअवस्थापनम्, आलिंगनविचार, चुम्बनविकल्पाः, नखरदनजातयः, दशनच्छेद्यविहयो, संवेशनप्रकाराश्चित्ररतानि, प्रहणनप्रयोगास् तद्युक्ताश् च सीत्कृतक्रमाः, पुरुषोपसृप्तानि पुरुषायितं, औपरिष्टकं नवमो, रतअरम्भअवसानिकं रतविशेषाः प्रणयकलहश् च

3   तीसरे अधिकरण का नाम कन्यासम्प्रयुक्तकहै । इसमें बताया गया है कि पुरुष को कैसी स्त्री से विवाह करना चाहिए। किस प्रकार परिचय प्राप्त कर प्रेम-सम्बन्ध स्थापित कर और फिर उससे विवाह किया जाए । इस अधिकरण में 5 अध्याय और 9 प्रकरण हैं। उल्लिखित 9 प्रकरणों को सुखी दाम्पत्य जीवन की कुञ्जी ही समझना चाहिए। कामसूत्र में  विवाह को धार्मिक बन्धन मानते हुए दो हृदयों का मिलन स्वीकार करते हैं। पहले दो हृदय परस्पर प्रेम और विश्वास प्राप्त कर एकाकार हो जाएँ तब विवाह बन्धन में बँधना चाहिए, यही इस अधिकरण का सारांश है। यह अधिकरण सभी प्रकार की सामाजिक, धार्मिक मर्यादाओं के अन्तर्गत रहते हुए व्यक्ति की स्वतन्त्रता का समर्थन करता है।

कन्यासंप्रयुक्तकम्   वरणसंविधानम् संबन्धनिश्चयः च, कन्याविस्रम्भणम्, बालायाम् उपक्रमाः इंगिताकारसूचनम् च, एकपुरुषाभियोगाः, विवाहयोग

4.  चतुर्थ अधिकरण का नाम भार्याधिकारिकहै। इसमें 2 अध्याय और 8 प्रकरण है। विवाह हो जाने के बाद कन्या ‘भार्या’ (wife) कहलाती है। एकचारिणी और सपत्नी (सौत ) दो प्रकार की भार्या होती है। इन दोनों प्रकार की भार्याओं के प्रति पति के तथा पति के प्रति पत्नी के कर्त्तव्य इस अधिकरण में बताए गए हैं। इस अधिकरण में स्त्रीमनोविज्ञान और समाजविज्ञान को सूक्ष्म अध्ययन निहित है। इस में भार्या का कर्तव्य, सपत्नी के साथ उसका व्यवहार तथा राजाओं के अंत:पुर के विशिष्ट व्यवहार क्रमश: वर्णित हैं।

भार्याधिकारिकम्   एकचारिणीवृत्तं प्रवासचर्या च, ज्येष्ठादिवृत्त

5.  पाँचवें अधिकरण का नाम पारदारिक है। इसमें 6 अध्याय और 10 प्रकरण हैं। परस्त्री और परपुरुष का परस्पर प्रेम किन परिस्थितियों में उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विच्छिन्न होता है । किस प्रकार परदारेच्छा पूरी की जा सकती है।, और व्यभिचारी से स्त्रियों की रक्षा कैसे हो सकती है।, यही इस अधिकरण का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। परदारा को वश में लाने का विशद वर्णन करता है जिसमें दूती के कार्यों का एक सर्वांगपूर्ण चित्रन हमें यहाँ उपलब्ध होता है।

पारदारिकम्, स्त्रीपुरुषशीलवस्थापनं व्यावर्तनकारणाणि स्त्रीषु सिद्धाः पुरुषा अयत्नसाध्या योषितः, परिचयकारणान्य् अभियोगा छेच्केद्, भावपरीक्षा, दूतीकर्माणि, ईश्वरकामितं, आन्तःपुरिकं दाररक्षितकं

6.  छठे अधिकरण का नाम वैशिकहै। इसमें 2 अध्याय और12 प्रकरण है। इस अधिकरण में वेश्याओं के चरित्र और उनके समागम उपायों आदि का वर्णन किया गया है। कामसूत्र में  वेश्यागमन को एक दुर्व्यसन मानते हुए बताया है कि वेश्यागमन से शरीर और अर्थ दोनों की हानि होती है। इस में वेश्याओं, के आचरण, क्रियाकलाप, धनिकों को वश में करने के हथकंडे आदि वर्णित हैं।

वैशिकम्, सहायगम्यागम्यचिन्ता गमनकारणं गम्योपावर्तनं, कान्तानुवृत्तं, अर्थागमोपाया विरक्तलिंगानि विरक्तप्रतिपत्तिर् निष्कासनक्रमास्, विशीर्णप्रतिसंधानं, लाभविशेषाः, अर्थानर्थनुबन्धसंशयविचारा वेश्याविशेषाश् च

7.   सातवें अधिकरण को नाम औपनिषदिकहै। इसमें 2 अध्याय और 6 प्रकरण हैं। इस अधिकरण में, स्त्री-पुरुष एक दूसरे को मन्त्र, यन्त्र, तन्त्र, औषधि आदि प्रयोगों से किस प्रकार वशीभूत करें, नष्टरोग को पुनः किस प्रकार उत्पन्न किया जाए, रूप-लावण्य को किस प्रकार बढ़ाया जाए, तथा बाजीकरण प्रयोग आदि मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। औपनिषदिक का अर्थ ‘टोटका’ है। इस का विषय वैद्यक शास्त्र से संबद्ध है। यहाँ उन औषधों का वर्णन है जिनका प्रयोग और सेवन करने से शरीर के दोनों वस्तुओं की, शोभा और शक्ति की, विशेष अभिवृद्धि होती है। इस उपायों के वैद्यक शास्त्र में ‘बृष्ययोग’ कहा गया है।

औपनिषदिकम्, सुभगंकरणं वशीकरणं वृष्याश् च योगाः, नष्टरागप्रत्यानयनं वृद्धिविधयश् चित्राश् च योगा

यह  संपादकीय परिचय मात्र है. इसका विस्तृत अध्ययन  अगले संपादकीय अपलिंक (uplink) में है

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