Dattatreya Jyanti: श्री दत्तात्रेय-जयन्ती- गुरु वंश के प्रथम गुरु

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श्री ( Dattatreya ) दत्तात्रेय-जयन्ती :  हिन्दू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में भगवान् विष्णु के अवतार महायोगीश्वर दत्तात्रेय जी का अवतरण हुआ था।

अत: इस दिन दत्त जयन्ती का उत्सव मनाया जाता है। दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं इसीलिए उन्हें ‘परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु’और ‘श्रीगुरुदेवदत्त’भी कहा जाता हैं।

श्रीमद्भागवत में महर्षि अत्रि एवं माता अनुसूया के यहाँ त्रिदेवों के अंश से तीन पुत्रों के जन्म लेने का उल्लेख मिलता है। दत्तात्रेय को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) अंशावतार मानते हैं।

पुराणों अनुसार इनके तीन मुख, छह हाथ वाला त्रिदेवमयस्वरूप है। चित्र में इनके पीछे एक गाय तथा इनके आगे चार कुत्ते दिखाई देते हैं। औदुंबर वृक्ष के समीप इनका निवास बताया गया है।

श्रीमद्भागवत के अनुसार महायोगीश्वर दत्तात्रेय जी ने चौबीस गुरुओं से शिक्षा पायी थी। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया था। दत्तात्रेय को नाथ संप्रदाय का संस्थापक माना है।

यह भी मान्यता है कि रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक भी दत्तात्रेय थे। उन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साथक, योगी माना जाता है। श्रीदत्तात्रेय श्रीविद्या के परम आचार्य हैं। उनके के अनेक शिष्य थे. उनके शिष्यों में भगवान परशुराम का भी नाम लिया जाता है।

दत्तात्रेय ने परशुरामजी को श्रीविद्या-मंत्र प्रदान की थी। मान्यता है कि शिवपुत्र कार्तिकेय को दत्तात्रेय ने अनेक विद्याएँ दी थी। भक्त प्रह्लाद को अनासक्ति-योग का उपदेश देकर उन्हें श्रेष्ठ राजा बनाने का श्रेय दत्तात्रेय को ही जाता है।

मुनि सांकृति को अवधूत मार्ग, कार्तवीर्यार्जुन को तन्त्र विद्या एवं नागार्जुन को रसायन विद्या इनकी कृपा से ही प्राप्त हुई थी। गुरु गोरखनाथ को आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि-योग का मार्ग भगवान दत्तात्रेय की भक्ति से प्राप्त हुआ।

‘अवतार-चरित्र’ और ‘गुरुचरित्र’  जैसे  वेदतुल्य ग्रंथ में दत्तात्रेय का उल्लेख है। दत्त जयंती में दत्त भक्तों द्वारा गुरुचरित्र का पाठ किया जाता है। इसमें श्रीपाद, श्रीवल्लभ और श्रीनरसिंह सरस्वती की अद्भुत लीलाओं व चमत्कारों का वर्णन है।

‘गुरुचरित्र’ का श्रद्धा-भक्ति के साथ पाठ और इसी के साथ दत्त महामंत्र ‘श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा’ का सामूहिक जप भी किया है। त्रिपुरा रहस्य में दत्त-भार्गव-संवाद के रूप में अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों का उपदेश मिलता है।

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श्री दत्तात्रेय जी के जन्म की कथा

श्रीमद्भागवत के अनुसार पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महर्षि अत्रि के श्रीविष्णु का तप करने  पर प्रसन्न होकर भगवान्‌ ने उनसे एक दिन कहा कि ‘मैंने अपने आपको तुम्हें दे दिया। ‘दत्तो मयाहमिति यद् भगवान् स दत्तः’ भगवान् विष्णु ही अत्रि के पुत्र रूप में अवतरित हुए और दत्त कहलाये।

अत्रिपुत्र होने से ये ‘आत्रेय’ कहलाते हैं। दत्त और आत्रेय के संयोग से इनका ‘दत्तात्रेय’ नाम प्रसिद्ध हो गया। इनकी माता का नाम अनसूया है, जो सतीशिरोमणि हैं तथा उनका पातिव्रत्य संसार में प्रसिद्ध है।

इस तथ्य पर एक कथा आधारित है जो इस प्रकार है ऋषि अत्री और माता अनुसूइया अपने दाम्पत्य जीवन को बहुत सहज भाव के साथ व्यतीत कर रहे थे।

देवी अनुसूइया जी की पतिव्रतता के आगे सभी के नतमस्तक हुआ करते थे। इनके जीवन को देखकर देवता भी प्रसन्न होते थे जब एक बार देवी लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को ऋषि अत्रि की पत्नि अनुसूइया के दिव्य पतिव्रत के बारे में ज्ञात होता है तो वह उनकी परीक्षा लेने का विचार करती हैं और तीनों देवियां अपने पतियों भगवान विष्णु, शंकर व ब्रह्मा को अनुसूइया के पतिव्रत की परीक्षा लेने को कहती हैं।

अन्ततः विवश होकर त्रिदेव साधुवेश बनाकर अत्रिमुनि के आश्रम में पहुँचे। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। अतिथियों को आया देख, देवी अनसूया ने उन्हें प्रणामकर अर्घ्य, फल-मूलादि अर्पित किये, किंतु वे बोले-हमलोग तब तक आतिथ्य स्वीकार न करेंगे जब तक आप निर्वस्त्र हो हमारे समक्ष नहीं आयेंगी।

यह बात सुनकर प्रथम तो देवी अनसूया अवाक् (आश्चर्यचकित) रह गयीं, किंतु आतिथ्य-धर्म की महिमा का लोप न हो जाय इस दृष्टि से उन्होंने नारायण का ध्यान किया, और अपने पतिदेव का स्मरण किया. और वे बोलीं-यदि मेरा पातिव्रत्यधर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छ:-छ: मास के शिशु हो जायें।

इतना कहना ही था कि तीनों देव छ: मासके शिशु हो रुदन करने लगे। तब माता ने उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया फिर पालने में झुलाने लगीं। इस प्रकार तीनों देवता ऋषी अत्रि के आश्रम में बालक रूप में रहने लगते हैं और देवी अनसूइया माता की तरह उनकी देखभाल करती ।

ऐसे ही कुछ समय व्यतीत हो गया। इधर देवलोक में जब तीनों देव वापस न आये तो तीनों देवियाँ अत्यन्त व्याकुल हो गयीं। फलतः नारद जी आये और उन्होंने सम्पूर्ण कथा सुनाई ।

तीनों देवियाँ अनसूया के पास आयीं और उन्होंने उनसे क्षमा माँगी। देवी अनसूयाने अपने पातिव्रत्य से तीनों देवों को पूर्वरूप में कर दिया।

इस प्रकार प्रसन्न हो तीनों देवों ने माता अनसूया से वर माँगने को कहा तो माता बोलीं-आप तीनों देव मुझे पुत्ररूप में प्राप्त हों। ‘तथास्तु’-कहकर तीनों देव और देवियाँ अपने-अपने लोक को चले गये। कालान्तर में ये ही तीनों देव अनसूया के गर्भ से प्रकट हुए। ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा तथा विष्णु के अंश से दत्तात्रेय जी का जन्म हुआ।

इस प्रकार अत्रि तथा अनसूया के पुत्र रूप में श्री दत्तात्रेय जी का अवतरण हुआ और इन्हीं के आविर्भाव की तिथि श्रीदत्तात्रेय जयन्ती कहलाती है।

दत्त पादुका :

ऐसी मान्यता है कि दत्तात्रेय नित्य प्रात: काशी में गंगाजी में स्नान करते थे। इसी कारण काशी के मणिकर्णिका घाट की दत्त पादुका दत्त भक्तों के लिए पूजनीय स्थान है। देश भर में भगवान दत्तात्रेय को गुरु के रूप में मानकर इनकी पादुका को नमन किया जाता है।

गिरनारक्षेत्र श्रीदत्तात्रेय जी का सिद्धपीठ है। इनकी गुरुचरणपादुकाएँ वाराणसी तथा आबूपर्वत आदि कई स्थानों पर हैं। इसके अलावा मुख्य पादुका स्थान कर्नाटक के बेलगाम में स्थित है।

भगवान् दत्त के नाम पर नाथ सम्प्रदाय कर्नाटक एवं महाराट्र में विशेष प्रसिद्ध है। इन स्थानों पर दत्तात्रेय जी के अनेक मन्दिर हैं। वहाँ दत्तजयन्ती के दिन इनकी विशेष आराधना-पूजाके साथ महोत्सव सम्पन्न होता है।

इस दिन व्रत एवं दत्त मन्दिर में जाकर दर्शन-पूजन करने का विशेष महत्त्व है।

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