Chhath Puja: सूर्यषष्ठी महोत्सव ‘छठपर्व’- बिहार का महापर्व

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Chhath Puja: पर्वोत्सवों की दृष्टि से कार्तिक मास का विशेष महत्त्व है। इसी कार्तिक मास में एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र पर्व मनाया जाता है, जिसे सूर्यषष्ठी ‘छठपर्व’ के नामसे जाना जाता है।

छठपर्व बिहार के सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय धार्मिक अनुष्ठान के रूप में जाना जाता है। इस अवसरपर प्रत्यक्ष देव भगवान् सूर्यनारायण की पूजा की जाती है। किंतु इस व्रत में सूर्य के साथ षष्ठी तिथि का समन्वय विशेष महत्त्व का है।

पुराणों तथा धर्मशास्त्रों में विभिन्न रूपों में ईश्वर की उपासना के लिये प्रायः पृथक्-पृथक् दिन एवं तिथियों का निर्धारण किया गया है। जैसे गणेशकी पूजाके लिये चतुर्थी तिथि की प्रसिद्धि है।

श्रीविष्णु के लिये एकादशी तिथि प्रशस्त मानी गयी है। इसी प्रकार सूर्य के साथ सप्तमी तिथि की संगति है। यथा-सूर्यसप्तमी, रथसप्तमी, अचलासप्तमी इत्यादि।

एक कथा के अनुसार राजा प्रियव्रत को अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई। महाराज ने महर्षि कश्यप से अपना दुःख का उपाय पूछा।

महर्षि ने महाराज को पुत्रेष्टियज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञ के फलस्वरूप महाराज को मालिनी नामक महारानी ने यथावसर एक पुत्रको जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था।

महारानी को मृत-प्रसव हुआ है, इस समाचार से पुरे नगर में शोक व्यास हो गया। महाराज प्रियव्रत के ऊपर तो मानो वजपात ही हुआ हो। वे शिशुके मृत शरीर को अपने वक्ष से लगाये उन्मत्तों की भाति प्रलाप कर रहे थे।

किसी में इतना भी साहस नहीं था कि वह दैहिक क्रिया के लिये बालक के शव को राजा से अलग कर सके। तभी एक आचर्यजनक घटना घटी। सभीने देखा कि आकाशसे एक ज्योतिर्मय विमान पृथ्वी की ओर आ रहा है।

विमान के समीप आने पर स्थिति और स्पष्ट हुई । उस विमान में एक दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी। राजा के द्वारा यथोचित स्तुति करने पर देवी ने कहा-मैं ब्रह्मा की मानसपुत्री षष्ठी देवी हूँ।

मैं समस्त संसार के बालकों की रक्षिका हूँ , एवं अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ-‘पुत्रदाऽहम् अपुत्राय।’ इतना कहकर देवीने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा।

महाराज के प्रसन्नता को सीमा न रही। वे अनेक प्रकार से षष्ठीदेवी की स्तुति करने लगे। तदनन्तर राजाने अपने राज्यमें ‘प्रति मास के शुक्ल पक्षको ‘षष्ठी’ तिथिको षष्ठी-महोत्सव के रूप में मनाया जाय’- ऐसी राजाज्ञा प्रसारित करायी।

तभी से लोक में बालकों के जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन आदि सभी शुभ अवसरोंपर षष्ठी–पूजन प्रचलित हुआ। इनके नैवेद्य में मीठे चावल का होना अनिवार्य है।

आज भी शिशुके जन्म से छठे दिन षष्ठी-पूजन (छठी) (Chhath Puja) बड़े धूमधामसे लोकगीत (सोहर), वाद्य तथा पक्वान्नों के साथ मनाने का प्रचलन है। प्रसूता को प्रथम स्नान भी इसी दिन कराने को परम्परा है।

इस पौराणिक प्रसंगसे यह पूर्णतया स्पष्ट होता है कि षष्ठी शिशुओं के संरक्षण एवं संवर्धन से सम्बन्धित देवी हैं , तथा इनकी विशेष पूजा षष्ठी तिथि को होती है, वह चाहे बच्चों के जन्मोपरान्त छठा दिन हो या प्रत्येक चान्द्र मास के शुक्लपक्ष को षष्ठी।

पुराणों में इन्हीं देवी का एक नाम ‘कात्यायनी’ भी मिलता है, जिनकी पूजा नवरात्र में षष्ठी तिथि को होती है- ‘षष्ठं कात्यायनीति च।’

ग्रन्थ में षष्ठीव्रत (Chhath Puja) की कथा अन्य पौराणिक कथाओं की तरह ही वर्णित है। शौनकादि मुनियों के पूछने पर श्रीसूतजी लोक कल्याणार्थ सूर्यषष्ठी व्रत का माहात्म्य, विधि तथा कथा का उपदेश करत है।

कार्तिके शुक्लपक्षे तु निरामिषपरो भवेत्।

पञ्चम्यामेकभोजी स्याद् वाक्यं दुष्टं परित्यजेत्॥

षष्ठ्यां चैव निराहारः फलपुष्पसमन्वितः।

सरित्तटं समासाद्य गन्धदीपैर्मनोहरैः॥

धूपैर्नानाविधैर्दिव्यैनैवेद्यैघृतपाचितैः ।

गीतवाद्यादिभिश्चैव महोत्सवसमन्वितैः॥

समभ्यर्च्य रविं भक्त्या दद्यादयं विवस्वते।

रक्तचन्दनसम्मिश्रं रक्तपुष्पाक्षतान्वितम्॥

पञ्चमीयुक्त षष्ठा का यहाँ सर्वथा निषेध किया गया है। यथा स्कन्दपुराण में ‘नागविद्धान कर्तव्या षष्ठी चैव कदाचन’

कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में सात्त्विक रूप से रहना चाहिये। पञ्चमी को एक बार भोजन करे। वाणी का संयम रखे, षष्ठी को निराहार रहे तथा फल-पुष्प, घृतपक्व नैवेद्य, धूप, दीप आदि सामग्रीको लेकर नदीतटपर जाय और गीत-वाद्य आदि से हर्षोल्लासपूर्वक महोत्सव मनाये।

भगवान् सूर्य का पूजन कर भक्ति पूर्वक उन्हें रक्त चन्दन तथा रक्त पुष्पअक्षतयुक्त अर्घ्य निवेदित करे । इसी ग्रन्थ में आगे अर्घ्य, प्रदक्षिणा एवं नमस्कार के मन्त्र भी उल्लिखित हैं।

सम्प्रति इस व्रत का सर्वाधिक प्रचार बिहार राज्यमें दिखायी पड़ता है। सम्भव है, इसका आरम्भ भी यहीं से हुआ हो और अब तो बिहार के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी इसका व्यापक प्रसार हो गया है।

इस (Chhath Puja)  व्रतको सभी लोग अत्यन्त भक्ति-भाव, श्रद्धा एवं उल्लास से मनाते हैं। सूर्याय॑ के बाद व्रतियों के पैर छूने और उनके गीले वस्त्र धोनेवालों में प्रतिस्पर्धा की भावना देखते ही बनती है।

इस व्रतका प्रसाद माँगकर खाने का विधान है। सूर्यषष्ठी-व्रत के प्रसाद में ऋतु-फल के अतिरिक्त आटे और गुड़ से शुद्ध घी में बने ‘ठेकुआ’ का होना अनिवार्य है; ठेकुआ पर लकड़ी के साँचे से सूर्य भगवान के रथ का चक्र भी अङ्कित करना आवश्यक माना जाता है।

षष्ठी के (Chhath Puja)  दिन समीपस्थ किसी पवित्र नदी या जलाशय के तटपर मध्याह्न से ही भीड़ एकत्र होने लगती है। सभी व्रती महिलाएँ नवीन वस्त्र एवं आभूषणादिकों से सुसज्जित होकर फल, मिष्टान्न और पक्वान्नों से भरे हुए नये बाँस से निर्मित सूप और दौरी (डलिया) लेकर षष्ठीमाता और भगवान् सूर्य के लोकगीत गाती हुई अपने-अपने घरोंसे निकलती हैं।

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भगवान के अर्घ्य का सूप और डलिया ढोने का भी महत्त्व है। यह कार्य पति, पुत्र या घर का कोई पुरुष सदस्य ही करता है। घर से घाट तक लोकगीतों का क्रम चलता ही रहता है, और यह क्रम तब तक चलता है जब तक भगवान् भास्कर सायंकालीन अर्घ्य स्वीकार कर अस्ताचल को न चले जाएँ।

सूपों और डलियों पर जगमगाते हुए घी के दीपक गंगा के तटपर बहुत ही आकर्षक लगते हैं। पुनः ब्राह्म मुहूर्त में ही नूतन अर्घ्य सामग्री के साथ सभी व्रती जल में खड़े होकर हाथ जोड़े हुए भगवान् भास्कर के उदयाचलारूढ होने की प्रतीक्षा करते हैं।

जैसे ही क्षितिज पर अरुणिमा दिखायी देती है वैसे ही मन्त्रों के साथ भगवान् सविता को अर्घ्य समर्पित किये जाते हैं। यह व्रत विसर्जन, ब्राह्मण-दक्षिणा एवं पारणा के पश्चात् पूर्ण होता है।

सूर्यषष्ठी-व्रत (Chhath Puja) के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्घ्य से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठी देवी का आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रात: अर्घ्य के पूर्व षष्ठीदेवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं।

मान्यता है कि पञ्चमी के सायंकाल से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान् सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति और ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है। इसीलिये लोक में यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नाम से विख्यात है।

सांसारिक जनों की तीन कामना प्रसिद्ध हैं- पुत्रैषणा,वितैषणा तथा लोकैषणा। भगवान् सविता प्रत्यक्ष देवता हैं वे समस्त अभीष्टों को प्रदान करने में समर्थ हैं-‘किं किंन सविता सूते।’

समस्त कामनाओं की पूर्ति तो भगवान् सविता से हो जाती है, किंतु वात्सल्य का महत्त्व माता से अधिक और कौन जान सकता है? परब्रह्म की शक्तिस्वरूपा । प्रकृति और उन्हींके प्रमुख अंश से आविर्भूता देवी षष्ठी,संतति प्रदान करने के लिये ही मुख्यतया अधिकृत हैं।

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अतः पुत्र की कामना भगवती षष्ठी से करना अधिक तर्क संगत प्रतीत होता है। इन्हीं पुराणोक्त कथाओं के भाव सूर्यषष्ठी-पर्व (Chhath Puja) के अवसर पर बिहार में महिलाओं द्वारा गाये जानेवाले लोकगीतों में भी देखने को मिलते हैं।

काहे लागी पूजेलू तुहूं देवलघरवा (सूर्यमन्दिर) हे। काहे लागी,

कर ह छठी के बरतिया हे, काहे लागी” ती अन-धन सोनवा लागी पूजी देवलघरवा हे,

कल पुत्र लागी, करीं हम छठीके बरतिया हे, पुत्र लागी”

इस गीत में समस्त वैभवों की कामना तो भगवान् भास्कर से की गयी है, किंतु पुत्र की कामना भगवती षष्ठी से ही की जा रही है। इन पुराणसम्मत तथ्यों को हमारी ग्रामीण महिलाओं ने गीतों में पिरोकर अक्षुण्ण रखा है।

सविता और षष्ठी दोनों की एक साथ उपासना से अनेक वाञ्छित फलों को प्रदान करने वाला यह सूर्यषष्ठी व्रत वास्तव में बहुत महत्त्वपूर्ण है।

पुत्रैषणा अर्थात् पुत्र व परिवार की संवृद्धि की कामना, वित्तैषणा—धन तथा भोगैश्वर्य की सामग्री की कामना । तथा  लोकैषणा अर्थात् लोक में पूजित होने की कामना, सत्ता, यश और प्रतिष्ठा की कामना ।

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