Ayodhya Ram Mandir: राम मंदिर का स्थापत्य और वास्तुकला

Ayodhya Ram Mandir
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Ayodhya Ram Mandir: भारतीय स्थापत्य में हिन्दू मन्दिर का विशेष स्थान है। भारत में हिंदू मंदिरों के स्थापत्य में वास्तु सिद्धांतों का वर्णन शिल्प शास्त्र और वास्तु शास्त्रों में किया गया है।

मंदिर का निर्माण में वैदिक शास्त्र द्वारा उल्लिखित नियमों और विनियमों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। मंदिर निर्माण के समय अनेक बातों का ध्यान में रखा जाता है।

सर्वप्रथम मंदिर निर्माण के स्थान की पवित्रता तथा उस स्थान का नक्षत्र ध्यान में रखा जाता है। मंदिर का निर्माण प्रारंभ शुभ योग के अनुरूप किया जाता है।

मंदिर के निर्माण में वैदिक शास्त्र के अनुरूप सोने, चांदी, तांबा धातु का उपयोग किया जाता है लेकिन लोहा नहीं। क्योंकि लोहा नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।

मंदिर का निर्माण करते समय अन्य सभी विशिष्टताओं का पालन किया जाए ताकि यह केवल सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित कर सके। भू तापीय ऊर्जा की जाँच करना होती है।

विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं का ध्यान रखते मंदिर का निर्माण इस तरह से किया जाता है कि नकारात्मक ऊर्जा शुद्ध हो जाए और मंदिरों में सकारात्मक ऊर्जा संचार हो मंदिर का निर्माण उत्तर-पूर्व दिशा में ही करते हैं।

Ayodhya Ram Mandir

मंदिर निर्माण में कई एकड़ भूमि की आवश्यकता होती हैं। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के साथ जुड़े हुए या अलग अन्य छोटे मंदिर या अन्य संरचनाये हो सकती हैं।

मंदिर स्थापत्य में अग्नि से लेकर जल तक, प्रकृति की छवियों से लेकर देवताओं तक, स्त्रीलिंग से लेकर पुल्लिंग तक, काम से लेकर अस्त्र तक अनेक रचनाओं और छवियों का प्रयोग होता है।

वास्तुकला के मुख्य रूप के रूप में हिंदू मंदिर वास्तुकला की कई शैलियाँ हैं, जिस में नागर शैली, द्रविड़ शैली प्रमुख हैं  हालांकि हिंदू मंदिर की मूल प्रकृति समान है, मुख्य रूप से हिन्दू मंदिर के अन्दर एक गर्भगृह होता है जिसमें मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित होती है।

गर्भगृह के ऊपर शिखर होता है जिसे दक्षिण में विमाना भी कहा जाता है। मन्दिर के गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा के लिए परिधि मार्ग होता है। इसके अलावा मंदिर में सभा के लिये सभा-कक्ष होता है।

Ayodhya Ram Mandir Design

हिंदू संस्कृति ने अपने मंदिर वास्तुकारों को सौंदर्य स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया है, और इसके वास्तुकारों ने कभी-कभी हिंदू जीवन शैली को व्यक्त करने के लिए मंदिर निर्माण में अन्य परिपूर्ण ज्यामितीय और गणितीय सिद्धांतों को अपनाकर रचनात्मक अभिव्यक्ति में काफी लचीलापन ला कर निर्माण में नवीन संरचना का विकास किया।

हिन्दू मंदिरों ( Ayodhya Ram Mandir )का महत्त्व और उनके आकार में उल्लेखनीय विस्तार हुआ तथा उनकी बनावट पर स्थानीय वास्तुकला का विशेष प्रभाव पड़ा। हिन्दू मंदिरों की उत्कृष्टता उड़ीसा तथा मध्यप्रदेश के खजुराहो में देखने को मिलती है। उड़ीसा के भुवनेश्वर में स्थित लगभग 1000 वर्ष पुराना लिंगराजा का मन्दिर वास्तुकला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

हालांकि, 13वीं शताब्दी में निर्मित कोणार्क का सूर्य मंदिर इस क्षेत्र का सबसे बड़ा और विश्वविख्यात मंदिर है। काल और वास्तु के दृष्टिकोण से खजुराहो के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मन्दिर 11वीं शताब्दी में बनाये गये थे।

गुप्त काल में वृहदस्तर पर मंदिरों का निमार्ण किया गया जिनमें वैष्णव तथा शैव दोनों पंथ के मंदिर हैं।

शैलियाँ

भारतीय उपमहाद्वीप तथा विश्व के अन्य भागों में स्थित मन्दिर विभिन्न शैलियों में निर्मित हुए हैं। मंदिरों की कुछ शैलियाँ निम्नलिखित हैं-

Madir Design

नागर शैली

उत्तरी भारत के क्षेत्र में नागर शैली का प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक देखा जा सकता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार नागर शैली के मंदिरों में गर्भगृह, मण्डप तथा अर्द्धमण्डप प्राप्त होते हैं।

नागर शैली में बनेगा रामलला का मंदिर

द्रविड़ शैली

दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण द्रविड़ शैली कहलाती है। इसमें मंदिर का आधार भाग वर्गाकार होता है तथा गर्भगृह के उपर का भाग पिरामिडनुमा सीधा होता है, जिसमें अनेक मंजिलें होती हैं।

इस शैली के मंदिरों की प्रमुख विशेषता यह हे कि ये काफी ऊॅंचे तथा विशाल प्रांगण से घिरे होते हैं। प्रांगण में छोटे-बड़े अनेक मंदिर, कक्ष तथा जलकुण्ड होते हैं। प्रागंण का मुख्य प्रवेश द्वार ‘गोपुरम्’ कहलाता है।चोल काल के मंदिर द्रविड़ शैली के सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है.

बेसर शैली (मिश्रित शैली)

बेसर का शाब्दिक अर्थ है मिश्रित अत एव नागर और द्रविड़ शैली के मिश्रित रूप को बेसर की संज्ञा दी गई है यह विन्यास में द्रविड़ शैली का तथा रूप में नागर शैली का होता है।

दो विभिन्न शैलियों के कारण उत्तर और दक्षिण के विस्तृत क्षेत्र के बीच सतह एक क्षेत्र बन गया जहां इनके मिश्रित रूप में बेसर शैली हुई इस शैली के मंदिर विंध्य पर्वतमाला से कृष्णा नदी तक निर्मित है लेकिन कला का क्षेत्र असीम है।

गणेश पूजा और वास्तु पूजा हम भारतीय कभी भी भगवान गणेश की पूजा के बिना कुछ भी शुरू नहीं करते हैं। भगवान गणेश की पूजा करने के बाद, हम वास्तु देवता को प्रसन्न करने के लिए वास्तु पूजा के लिए भी जाते हैं।

मंदिर( Ayodhya Ram Mandir ) के निर्माण में सब कुछ सही ढंग से करना बहुत आवश्यक है। यह कहा जाता है कि, जो अच्छी तरह से शुरू होता है, वह पूरी तरह से पूरा हो जाता है।

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