Arjunarishta: अर्जुनारिष्ट क्यों है हदयरोगों के लिए महान औषधि

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Arjunarishta: आयुर्वेद हृदय को शरीर के अन्य अंगों को रक्त क्री आपूर्ति करने वाला महज एक महत्वपूर्ण अंग नहीं मानता। वह इसे आध्यत्मिक-आत्मिक महत्व का अंग भी मानता है।

चरक के अनुसार, ‘हृदय आत्मचेतना का केन्द्र है । मानव शरीर के जो महत्वपूर्ण घटक हैं, उनमें दो हाथ, दो पैर, धड़-गरदन और सिर, पांच ज्ञानेन्द्रियों, मस्तिष्क, बुद्धिमत्ता और आत्मा का समावेश है।

उक्त सभी घटक हदय की सामान्य कामकाजी प्रक्रिया पर निर्भर करते हैं। हदय के अस्वस्थ होने पर इन सभी घटकों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, तो इन घटकों में से किसी एक या अधिक के अस्वस्थ होने पर हदय के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है।

ऐसे में हदय को स्वस्थ रखने के लिए व सम्पूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आचार-विचार, आहार, व्यायाम और योग-क्रियाओं को अति महत्वपूर्ण माना गया है।

आयुर्वेद की मानें तो हृदय-रोगों का होना, अनुचित खान-पान, आरामतलब जिन्दगी, व्यायाम से नाता न रखना, विचार और व्यवहार संबंधी पाबन्दी आदि वे करण है जो हृदय-रोगों को पनपने का मौका देते है ।

यदि हृदय विकारग्रस्त हो जाता है, तो उसके उपचार के लिए आयुर्वेद के प्राचीन विद्वानों ने हृदय रोग की चिकित्सा में ‘अर्जुन’ वृक्ष की छाल को बहुत गुणकारी माना गया है।

आयुर्वेदाचार्यों  ने इसे हृदय रोग के लिए महान औषधि की संज्ञा दि है। वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने अनुसंधान व प्रयोगों में ‘अर्जुन’ वृक्ष की छाल को हृदय रोग की चिकित्सा में बहुत गुणकारी पाया है।

अर्जुन घृत को किसी भी प्रकार के हृदय रोगों की अचूक दवा माना गया है. आयुर्वेद के अनुसार अर्जुन बलकारक है तथा लवण-खनिजों के कारण हृदय की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है तथा हृदय की मांसपेशियों में शिथिलता लाने में मदद करता है।

इसका मुख्य उपयोग हृदय रोग के उपचार में किया जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग रक्तपित्त, प्रमेह, मूत्राघात, शुक्रमेह, रक्तातिसार तथा क्षय और खांसी में भी लाभप्रद रहता है।

विभिन्न भाषाओं में नाम: संस्कृत- ककुभ, हिन्दी- अर्जुन कोह, मराठी- अर्जुन सादड़ा, गुजराती- सादड़ो, तेलुगू- तेल्लमद्दि, कन्नड़- मद्दि, तमिल मरुतै, इंग्लिश- अर्जुना, लैटिन- टरमिनेलिया अर्जुन।

ह्रदय रोग के लक्षण

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  • सिर में दर्द
  • आँखों के सामने अंधेरा छा जाना.
  • त्वचा का तेजहीन या असामान्य दिखाई देना
  • दौड़ते समय, सीढ़ियों पर चढ़ते समय या साइकिल चलाने पर छाती में दर्द
  • सांस फूंलना
  • बेहोशी
  • हृदय में प्रदाह ( इन्फ्लैमेशन ) के चलते बुखार आना
  • खांसी
  • हृदय-कपाट में अवरोध के चलते हिचकी आना
  • मुंह का स्वाद बिगड़ा रहना
  • भूख न लगना
  • प्यास अधिक लगना

अर्जुन ( Arjunarishta ) की छाल का प्रयोग:-

हदयरोगों के उपरोक्त लक्षण आने पर हदयरोगों के उपचार व उनसे बचाव हेतु अर्जुन के पेड़ की छाल से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।

अर्जुन की छाल ( Arjunarishta ) को पाउडर में या फिर काढ़े के रूप में दिल के दौरे के दौरान व बाद में सेवन से हृदय की दशा में उल्लेखनीय सुधार होता है। इसके पाउडर को रोजाना चार बार एक-एक ग्राम की मात्रा में मरीज को दे।

अनुभवी चिकित्सक के परामर्श पर घी, दूध, शहद या पिप्पली पाउडर के साथ मिलाकर इसका सेवन करने से विशेष लाभ होता है। काढ़े के रूप में अर्जुन की छाल का सेवन करने के लिए इसके लगभग 30 ग्राम पाउडर को आधा लिटर पानी में तब तक उबालें, जब तक कि पानी की मात्रा घटकर एक चौथाई न हो जाए।

फिर इस काढे को घी या शहद के साथ मिलाकर सेवन करें। घी के साथ यदि काढे का सेवन करना है तो इसे गुनगुना गर्म रहने दें। शहद के साथ सेवन करने से पूर्व काढे को ठंडा कर लेना जरूरी होता है।

अर्जुन छाल पाउडर को गाय के घी के साथ उबालकर रोजाना दो बार एक-एक चाय चम्मच की मात्रा में लेने से विशेष लाभ होता है। वैसे इन दिनों अर्जुन छाल, अर्जुनारिष्ट, अर्जुनाघृत व अर्जुन कैप्सूल के रूप में उपलब्ध है।

हृदय रोग के रोगी के लिए अर्जुनारिष्ट का सेवन बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ है।

अर्जुनारिष्ट  (Arjunarishta ) के फायदे:

हृदय रोग को जड़ से मिटाता है:

अर्जुनारिष्ट का उपयोग कार्डियोटोनिक के रूप में किया जाता है अर्जुनारिष्ट दिल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है और हृदय की मांसपेशियों को मजबूत करता है।

यह जड़ी बूटी शरीर में स्वस्थ रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के लेवल के स्थिर रखने में भी उपयोगी है। अर्जुनारिष्ट वायुमार्ग से बलगम को हटाने के लिए उपयोगी है और अस्थमा के इलाज़ के लिए एक प्रभावी उपाय के रूप में काम करता है।

प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है अर्जुनारिष्ट स्पर्म के बनने को बढ़ाता है और स्पर्म की क्वालिटी में सुधार की दिशा में सक्रिय रूप से काम करता है।

उच्च और निम्न रक्तचाप की स्थिर करता है:

अर्जुनारिष्ट ( Arjunarishta )  कार्डियो-वैस्कुलर में सुधार करता है और रक्तचाप को सामान्य स्तर पर स्थिर करता है। अर्जुनारिष्ट में सक्रिय फाइटोकेमिकल्स और शारीरिक गुण होते हैं जो दिल के रोगों का उपचारकरने में मदद करते हैं।

हार्ट अटैक को रोकता है:

अर्जुनारिष्ट का उपयोग म्योकार्डिअल इन्फ्राक्शन और कंजेस्टिव हार्ट फेल के मामलों में किया जाता है। यह खून की नालियों की रुकावट को रोकता है और दिमाग को खून  की उचित मात्रा देता है। यह शरीर के एक तरफ की कमजोरी या पक्षाघात, सिरदर्द, आवाज़ का धीमा होना, भ्रम, अशांति, चेतना में बदलाव और सिर में चक्कर आने का कारण बन सकता है। अर्जुनारिष्ट दिल की रुकावट को रोकने में मदद करता है।

अर्जुनारिष्ट का उपयोग कैसे करें:

भोजन के बाद अर्जुनारिष्ट गुनगुने पानी के साथ दिन में दो बार लेना उचित है।

अर्जुनारिष्ट को भोजन के बाद लेना चाहिए। अर्जुनारिष्ट हृदय की असामान्य धड़कन को कम करता है, कार्डियो-वैस्कुलर में सुधार करता है और रक्तचाप को सामान्य स्तर पर स्थिर करता है।

रक्तचाप को ठीक करने के लिए अर्जुनारिष्ट को दिन में दो बार दूध के साथ लेने की सलाह दी जाती है।

अर्जुनारिष्ट: अर्जुनारिष्ट सिरप 2 4 चम्मच (20 मि.ली.) दिन में दो बार बराबर मात्रा में पानी के साथ लेना चाहिए। अर्जुनारिष्ट को लगभग 4 से 6 सप्ताह तक लिया जाता है।

अर्जुनारिष्ट ( Arjunarishta )  से किसे परहेज करना चाहिए:

  • इसे किसी प्रोफेशनल की सलाह से ही लिया जाना चाहिए|
  • मधुमेह के रोगियों को इससे बचना चाहिए|
  • 5 वर्ष से ज्यादा उम्र के बच्चों के लिए यह सुरक्षित है|
  • गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान इसे लेने से बचें|

उचित आहार: 

  1. उपचार के दौरान चाय का सेवन कम करें या न करें,
  2. हदय- धमनियों में अवरोध का कारण कोलेस्टेरॉल वाले खाद्य पदार्थों के अधिक सेवन का दुष्परिणाम है लगभग सभी प्रकार के चर्बीदार खाद्य पदार्थों मसलन, पोर्क, बीफ, मांस, घी, बटर आदि का सेवन न करें।
  3. कार्बोहाइड्रेट्स सेवन भी कम मात्रा में करें। कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड्स के संश्लेषण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है
  4. नमक का सेवन कम मात्रा में करें। रोजाना अधिकतम 2 से 3 ग्राम की मात्रा में नमक का सेवन करें।
  5. रेशेदार खाद्य पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करें ।
  6. लहसुन व सोंठ को नियमित प्रयोग में लाएं। लहसुन रक्त के कोलेस्ट्रॉल में कमी लाता है, तो सोंठ रक्त में थक्का बनने की प्रक्रिया में रोक लगाने में सहायक है ।

Note: इस लेख में दिए जा रहे टिप्स पर अमल करके और उचित उपचारसे हृदय-रोग की गंभीरता को कम कर सकते है या उससे पूरी तरह निजात पा सकते हैं

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