16 Sanskar: मनुष्य के 16 संस्कार कौन से हैं?

16 Sanskar
438Views

16 Sanskar :  हिंदू धर्म ग्रंथों में ही संस्कारों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। महर्षि वेदव्यास के अनुसार मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक  सोलह संस्कार संपन्न किए जाते हैं।

वर्तमान समय में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के अनुयायी में गर्भाधान से मृत्यु तक १६ संस्कारों होते है। जो मानव को उसके गर्भाधान संस्कार से लेकर अन्त्येष्टि क्रिया तक किए जाते हैं। प्राचीन काल में प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था।

उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या सोलह निर्धारित हो गई।

हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। संस्कार हमारे धार्मिक और सामाजिक जीवन की पहचान होते हैं।

अच्छे सभ्य समाज के लिए संस्कार शिक्षा अत्यंत आवश्यक हैं lअल्पायु से ही बच्चों में अच्छे संस्कार हो , माता पिता , बड़ो का सन्मान करे। केवल  शिक्षा ही सब कुछ नहीं है। बड़े बड़े अरबपतियों के माँ बाप भी आज अभाव की जिंदगी बिताने पर मजबूर है , अगर आपने बच्चो को सिर्फ शिक्षा दी और संस्कार शिक्षा नहीं दिए तो व्यक्ति बड़ा तो बन जायेगा मगर इज़्ज़त करना और परिवार बनाना नहीं सिख पायेगा।

मैं समझता हूँ वर्तमान में संस्कारों की बड़ी आवश्यता है। भारतीय संस्कृति में मनुष्य को राष्ट्र, समाज और जनजीवन के प्रति जिम्मेदार और कार्यकुशल बनाने के लिए जो नियम तय किए गए हैं , उन्हें संस्कार कहा गया है।

यह न केवल हमें समाज और राष्ट्र के अनुरूप चलना सिखाते हैं बल्कि हमारे जीवन की दिशा भी तय करते हैं। संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। इन्हीं संस्कारों से गुणों में वृद्धि होती है।

संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोच्चरण आदि होता है उसका वैज्ञानिक महत्व साबित किया जा चुका है। सनातन धर्म में मनुष्यों को अपना जीवन इन 16 संस्कारो के अनुसार व्यतीत करने की आज्ञा दी गयी है l

विभिन्न धर्म ग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार,  सीमन्तोन्नयन संस्कार,  जातकर्म संस्कार,  नामकरण संस्कार,  निष्क्रमण संस्कार,  अन्नप्राशन संस्कार,  चूड़ाकर्म संस्कार, विद्यारंभ संस्कार, कर्णवेध संस्कार, यज्ञोपवीत संस्कार, वेदारम्भ संस्कार, केशान्त संस्कार, समावर्तन संस्कार, विवाह संस्कार  तथा अन्त्येष्टि (अंतिम ) संस्कार,  ही मान्य है।

क्या आप जानते है कि, भगवान् श्री राम के संस्कार ऋषि वशिष्ठ ने करवाए थे, और भगवान् श्री कृष्ण के संस्कार ऋषि संदीपनी ने करवाए थे l

16 Sanskar

1. गर्भाधान संस्कार

हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान सबसे पहला संस्कार है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है।

उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार: गर्भधारण शुभ मुहुर्त में हो तो उसका परिणाम भी उत्तम होता है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है। गर्भधारण के लिए मासिक के पश्चात चतुर्थ व सोलहवीं तिथि इसके अलावा प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथि शुभ एवं उत्तम होती है।

गर्भ धारण के लिए बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार सबसे शुभ वार माना है । ज्योतिष के अनुसार गर्भ धारण के समय लग्न शुभ होकर बलवान होना चाहिए तथा केन्द्र (1, 4 ,7, 10) एवं त्रिकोण (5,9) में शुभ ग्रह व 3, 6, 11 भावों में पाप ग्रह हो तो उत्तम रहता है।

जब लग्न को सूर्य, मंगल और बृहस्पति देखता है और चन्द्रमा विषम नवमांश में होता है तो इसे श्रेष्ठ स्थिति माना जाता है।

गर्भधारण के लिए उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, मृगशिरा, अनुराधा, हस्त, स्वाती, श्रवण, घनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र शुभ और उत्तम माने गये हैंl

2.  पुंसवन संस्कार 

पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है।

3.  सीमन्तोन्नयन संस्कार

सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।

यह संस्कार गर्भ के छठवें अथवा आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्च सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है।

इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं।  भक्त प्रह्लाद और अभिमन्यु इसके उदाहरण हैं।

4. जातकर्म संस्कार

नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। नालछेदन के पूर्व स्वर्ण पात्र में छह बूंद शहद और दो बूंद घी का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर अनामिका अंगूली से वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ चटाया जाता है।

इसके  उपरांत पिता यज्ञ करता है तथा नौ मन्त्रों का विशेष रूप से उच्चारण के बाद बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।

5. नामकरण संस्कार

नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है।जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है।

इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।

6. निष्क्रमण संस्कार

जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान सूर्य के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना है।

इसके पीछे शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना है। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है।

7. अन्नप्राशन संस्कार

अन्नप्राशन संस्कार बच्चे को भोजन कराने का प्रसंग होता है। अन्नप्राशन संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। जन्म से छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए।

अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था अब अन्न ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से बलवान व प्रबुद्ध बनाना है। खीर से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है।

‘अमृत: क्षीरभोजनम्’  हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है।

8. चूडाकर्म या मुंडन संस्कार

चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है। बच्चे की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारने का विधान है , जिसे मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहा जाता है। इससे बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है।

9. विद्यारंभ संस्कार

प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को विद्याध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है।  अन्नप्राशन के बाद ही शिशु बोलना शुरू करता है। इसलिये अन्नप्राशन के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है।

माता-पिता तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

10. कर्णभेद या कर्णवेध संस्कार

कर्णवेध संस्कार इसका अर्थ है- कान छेदना। कर्णभेद संस्कार में कान और नाक छेदे जाते थे। यह संस्कार जन्म के छह माह बाद से लेकर पांच वर्ष की आयु के बीच किया जाता था।

कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। वर्तमान समय में वैज्ञानिकों ने भी यह प्रमाणित भी किया है की इस संस्कार से कान की बिमारियों से भी बचाव होता है l बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है।

कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।

11. यज्ञोपवीत या उपनयन संस्कार 

उपनयन संस्कार का अर्थ गुरु के पास ले जाना है । इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत अथवा उपनयन संस्कार बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है।

धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: पांच वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इस संस्कार में वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ बच्चे को एक पवित्र धागा पहनाया जाता है, इसे यज्ञोपवीत या जनेऊ भी कहते हैं l

इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। गायत्री मंत्र सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है।

यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

12.वेदारंभ संस्कार

प्राचीन काल से ही वेदारंभ संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है। वेदारंभ संस्कार का अभिप्राय है शिक्षा के माध्यम से ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना है।

वेदारंभ संस्कार में बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित  करने के लिये आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे।

असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। इस संस्कार को जन्म से 5वे या 7 वे वर्ष में किया जाता है। यह संस्कार प्रायः वसन्त पंचमी को किया जाता है।

13 केशांत संस्कार

गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है।

वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

14. समवर्तन संस्कार

गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है।

यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे।

इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

15. विवाह संस्कार

प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये विवाह संस्कार सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का विधान है। वेदाध्ययन के उपरान्त जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती है तो उसे गृर्हस्थ्य आश्रम में प्रवेश कराया जाता है ।

लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता है । सनातन धर्म में विवाह को समझौता नहीं संस्कार कहा गया है। ये संस्कार बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है, और वेदों पर आधारित मन्त्रों को पढ़ते हुए अग्नि के 7 फेरे लिए जाते हैं l

हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म विवाह, दैव विवाह, आर्ष विवाह, प्रजापत्य विवाह, आसुर विवाह, गन्धर्व विवाह, राक्षस विवाह एवं पैशाच विवाह ।

16. अंत्येष्टि संस्कार

अन्त्येष्टि को अंतिम संस्कार अथवा अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है। आत्मा में अग्नि का अधीन करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं।

हमारे शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से मनुष्यलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर मनुष्यलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है।

प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है। मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। अन्त्येष्टि संस्कार के समय आत्मा शांति के लिए वेद-मंत्र पढ़े जाते हैं।

इस प्रकार पवित्र सोलह संस्कार ( 16 Sanskar ) संपन्न किए जाते हैं ।

यह भी पढ़ें:  Ganga Dashara: क्यों मानते हैं गंगा दशहरा?

admin
the authoradmin

Leave a Reply

four + eight =