सत्यनारायण कथा – महत्व एवं सम्पूर्ण पूजन विधि

Satyanarayan Katha
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सत्यनारायण कथा व्रत एवं कथा स्कंदपुराण के रेवाखंड से संकलित की गई है।

सत्य को नारायण के रूप में पूजना ही सत्यनारायण की पूजा है। अत: सत्य और नारायण परस्पर अभिन्न हैं।

दोनों में ऐकात्म्य सम्बन्ध होने के कारण ‘सत्यश्चासौ नारायणः विभिन्न पुराणों में ‘सत्यान्नास्ति परो धर्मः’, ‘सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्’, ‘सत्येन लोकाञ्जयति’, ‘नास्ति सत्यात् परं तपः’ इत्यादि वचनों द्वारा पदे-पदे सत्यकी महिमाका प्रख्यापन किया है।

हिंदू धर्मावलंबियो के बीच सबसे प्रतिष्ठित भगवान सत्यनारायण की कथा एवं व्रत के रूप में लोक-प्रचलित है।

कुछ लोग मनोरथ पूर्ण  होने पर, इस कथा का आयोजन करते हैं। अन्य पर्वों पर भी इस कथा को करने का विधान है।

प्रायः पूर्णमासी को इस कथा का परिवार में वाचन करने का विधान है। इस कथा में बताया गया है कि सत्य का पालन न करने पर किस तरह की परेशानियां आती है।

इसलिए जीवन में सत्य व्रत का पालन पूरी निष्ठा और सुदृढ़ता के साथ करना चाहिए। उनका सत्यनारायण स्वरूप इस कथा में बताया गया है।

पूजा सामग्री एवं विधि

सत्यनारायण कथा  की पूजा में  निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है।

  1. केले के पत्ते
  2. फल
  3. पंचामृत
  4. पंचगव्य
  5. सुपारी
  6. पान
  7. तिल
  8. मोली
  9. रोली
  10. कुमकुम
  11. दूर्वा

Satyanarayan Katha

सत्यनारायण कथा  की पूजा के लिए दूध में, मधु, केला, गंगाजल, तुलसी पत्ता, मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है, जो भगवान को काफी पसंद है।

इन्हें प्रसाद के तौर पर फल, मिष्टान्न के अलावा आटे को भून कर उसमें चीनी मिलाकर एक प्रसाद बनता है  पंजिरी  कहा जाता है, उसका भी भोग लगता है।

जो व्यक्ति सत्यनारायण की पूजा का संकल्प लेते हैं उन्हें दिन भर व्रत रखना चाहिए।

पूजन स्थल को गाय के गोबर से पवित्र करके वहां एक अल्पना (रंगोली) बनाएं और उस पर पूजा की चौकी रखें। इस चौकी के चारों पाये के पास केले का वृक्ष लगाएं। इस चौकी पर शालिग्राम या ठाकुर जी या श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित करें।

पूजा करते समय सबसे पहले गणपति की पूजा करें फिर क्रमश: पंच लोकपाल, सीता सहित राम, लक्ष्मण की, राधा कृष्ण की।

इनकी पूजा के पश्चात ठाकुर जी व सत्यनारायण की पूजा करें। इसके बाद लक्ष्मी माता की और अंत में महादेव और ब्रह्मा जी की पूजा करें।

पूजा के बाद सभी देवों की आरती करें और चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण करें।

पुरोहित जी को दक्षिणा एवं वस्त्र दे उपरांत भोजन कराएं। पुरोहित जी के भोजन के पश्चात उनसे आशीर्वाद लेकर आप स्वयं भोजन करें।

सत्यनारायण व्रत एवं कथा स्कंदपुराण के अनुसार-

सत्यनारायण के मूल पाठ में लगभग 170 श्लोक संस्कृत में उपलब्ध है जो पांच अध्यायों में बंटे हुए हैं। अलग-अलग अध्यायों में छोटी कहानियों के माध्यम से बताया गया है इस कथा के दो प्रमुख विषय हैं- जिनमें एक है संकल्प को भूलना और दूसरा है प्रसाद का अपमान।

सत्यनारायण व्रतकथा के दो भाग हैं, व्रत-पूजा एवं कथा।

कथा: 

नारद जी भगवान श्रीविष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति करते हैं। स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहां आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउंगा।

नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूं। उसे बतायें।

व्रतमस्ति महत्पुण्यं स्वर्गे मत्र्ये च दुर्लभम्।

तव स्नेहान्मया वत्स प्रकाशः क्रियतेऽधुना॥

सत्यनारायणस्यैव व्रतं सम्यग् विधानतः।

कृत्वा सद्यः सुखं भुक्त्वा परत्र मोक्षमाप्नुयात्॥

श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूं, सुनें।

हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान व्रत है। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है।

जिसे-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ अर्पित करना चाहिए।

केले के फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण अथवा गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब निवेदित करनी चाहिए।

बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए।

ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।

विशेष

सत्यनारायण कथा प्रति मास के पूर्णमासी के दिन करने का विशेष फल प्राप्त होता है। घर में सुख शांति , मन सदैव प्रसन्न रहता है।
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धन्यवाद।

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